सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

बिल्लू का सबक- अच्छा इंसान बनने की कोशिश करो

(बाल जगत)


ये कहानी है रायबरेली के दक्ष और अथर्व की है। दोनों पक्के दोस्त थे। सब लोग दक्ष को प्यार से बिल्लू और अथर्व को कुक्कू बुलाते थे। बिल्लू पढऩे में होशियार था, जबकि कुक्कू सामान्य। बिल्लू को इस बात पर घमंड था, क्योंकि उसको क्लास में हमेशा ही शाबाशी मिलती थी। सब लोग उसे कुक्कू से ज्यादा तवज्जो देते थे, लेकिन कुक्कू के बातचीत के ढंग के सभी मुरीद थे, परन्तु टीचर बिल्लू की ज्यादा तारीफ किया करती थीं। धीरे-धीरे दोनों बड़े हुए। बिल्लू हमेशा कुक्कू से एक कदम आगे ही रहा। इस कारण कुक्कू के परिवार वाले हमेशा बिल्लू से कुक्कू की तुलना किया करते थे। कॉलेज तक दोनों ने साथ-साथ ही पढ़ाई की। अब तक कुक्कू ने अपना सामाजिक दायरा काफी बढ़ा लिया था। वहीं बिल्लू पढ़ाई में मस्त रहता था। कुक्कू की मां इस बात से काफी परेशान रहती थी। वो कुक्कू को बार-बार समझाती थी कि समाज में ज्यादातर लोग तुझे जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि सब तुझे पसंद ही करते हैं। अरे पढ़-लिख जाएगा तो सब सलाम ठोकेंगे, तारीफ करेंगे नहीं तो सब लोग पीठ-पीछे तेरी नहीं, हमारी बुराई करेंगे। कुक्कू को मां की यह बातें काफी बुरी लगती थीं, लेकिन वो भी क्या करे उसका मन पढ़ार्ई में ज्यादा न लगता था। परिस्थितियां बदलने के साथ-साथा कुक्कू और बिल्लू की राह भी बदल गई। बिल्लू पढऩे के लिए रायबरेली छोड़कर लखनऊ निकल गया, जबकि कुक्कू रायबरेली में रहा। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे कम होने लगी। लगभग पूरा दिन साथ बिताने वाले दोस्त अब कभी-कभी ही बात करते थे। कुक्कू को बिल्लू की बहुत याद आती थी। वहीं बिल्लू अपने नए दोस्तों में मस्त हो चुका था। एक बार किसी काम से कुक्कू लखनऊ गया तो उसने सोचा क्यों न बिल्लू से भी मिल लिया जाए। वो बिल्लू से मिलने उसके कॉलेज गया, लेकिन बिल्लू ने पहचान तक न दिखाई। बिल्लू अब शहरी हो गया था। बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगा था। बिल्लू अपनी मां की बात (बेटा चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ पर पैर जमीन पर ही रहने देना) को पूरी तरह भूल चुका था। कुक्कू बुरी याद लेकर वापस लौट गया। वापस घर जाते समय, कार में उसके पहचान वाले ने उससे पूछा- क्योंï, मिल आए अपने दोस्त से? तो उसने बुझे मन से कहा, हां मिल आया। कुक्कू का साथी (बड़ी राजनीतिक पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष) सब समझ गया और उसने कहा कि दोस्त चिंता मत करो वक्त सब का आता है। अब दोनों की दोस्ती लगभग खत्म हो चुकी थी। बिल्लू की होशियारी के किस्से कुक्कू को बीच-बीच में मिलते रहे। इसी बीच बिल्लू को एक बड़ी कंपनी से बड़ा सा ऑफर मिला। लखनऊ में छह महीने की ट्रेनिंग के बाद मुंबई जॉइन करना था।
            अब समय करवट लेने वाला था और इसी दिन का इंतजार कुक्कू को भी था। बड़ी राजनीतिक पार्टी ने कुक्कू को उसकी सामाजिक छवि और निचले तबके तक पकड़ को देखते हुए चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया। इधर, कुक्कू चुनाव अभियान में व्यस्त हो गया और उधर, बिल्लू ट्रेनिंग में मस्त हो गया। अब आए दिन अखबारों में अथर्व प्रताप सिंह (कुक्कू) का नाम छपने लगा। यह नाम अखबार में पढ़कर बिल्लू को जाना पहचाना महसूस होता था, पर उसने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अंतत: कुक्कू अपने चुनाव अभियान में सफल हुआ। उसके क्षेत्र की जनता ने उसके व्यवहार और वाकपटुता के चलते सिर आंखों पर बिठ लिया और वो सांसद बन गया। अब लखनऊ की फिजाओं में अथर्व प्रताप सिंह का नाम गूंजने लगा। इस बीच बिल्लू की ट्रेनिंग भी पूरी होने वाली थी और पुलिस इनवेस्टिगेशन होना बकाया था। लखनऊ में हुए झगड़े में बिल्लू के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यही मामला उसकी राह का रोड़ा बन गया। इस मामले के कारण बिल्लू को नो-ड्यूस नहीं मिला। कंपनी ने बिल्लू को बता दिया कि तुम बहुत होशियार हो। हमें तुम्हारा काम भी पसंद है, लेकिन तुम्हारे खिलाफ मामला दर्ज है। इसे किसी भी तरह निपटाओ। अब बिल्लू परेशान हो गया। उसने सारी बात अपने घर पर बताई। उसकी मां ने उसको बताया कि अरे बेटा कुक्कू की मदद क्यों नहीं लेता, वो तो अब बड़ा नेता बन गया है। तू ने सुना नहीं क्या नाम अथर्व प्रताप सिंह। तब बिल्लू को याद आ गया कि जिसके बारे में वो रोज अखबार में पढ़ता था वो उसका बचपन का दोस्त कुक्कू है।
                      बिल्लू भी जानता था कि उसने कुक्कू के साथ कैसा व्यवहार किया था। इस कारण बिल्लू, कुक्कू से बात करने में हिचकिचा रहा था। किसी तरह हिम्मत बांधकर बिल्लू, कुक्कू के बंगले के बाहर जाकर खड़ा हो गया। देखा तो चारों ओर सुरक्षा का घेरा बिना इजाजत कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। कुक्कू ने बिल्लू को बाहर खड़े देखा तो कुक्कू सुरक्षा घेरा ओर सारे लोगों को छोड़कर सीधे बंगले के बाहर बिल्लू को लेने पहुंच गया। यह देख सभी भौचक रह गए। कुक्कू के पीए से रहा न गया और वो तपाक से बोला, साहब साधारण से आदमी के लिए इतना प्रेम? तो कुक्कू ने डांटते हुए कहा कि ये कोई साधारण आदमी नहीं मेरे बचपन का दोस्त (बिल्लू) दक्ष है। दुर्भाग्य से इसके पैर जमीन से उठ गए थे पर शायद अब वापस जमीन पर आ गए हैं। ऐसा कहते हुए कुक्कू ने बिल्लू की जेब में नो-ड्यूज रख दिया। इसके बाद दोनों गले मिले।
                    तो मेरे नन्हें दोस्तों जीवन में चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ, अपने पहले के हालात, पुराने दोस्तों और माता-पिता की बताई हुई बातों को कभी न भूलना, क्योंकि ये ही जीवन का आधार हैं। इसी से तुम्हारी समाज में पहचान बनती है, क्योंकि अमीर तो बहुत लोग बन जाते हैं पर अच्छा इंसान बहुत कम लोग बन पाते हैं।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

राहुल की जुबानी: वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

राहुल की जुबानी: वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

मुंबई में एक बार फिर सुबह हुई। देखते ही देखते सूरज की किरणें इस शहर को फिर रफ्तार देने के लिए फैल गईं, लेकिन मेरी किस्मत में यह सुबह कड़वी हकीकत लेकर आई। मैं नाली के किनारे सड़क पर पड़ी थी। सिर पर चोट के कारण खून बह रहा था। दर्द से बिलख उठी, रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। तब किसी ने मुझे उठाया और मेरे जख्मों पर दवा लगाने के बाद मुझे अनाथालय पहुंचा दिया। तब मेरी उम्र कुछ छह माह रही होगी। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ यह जानने-समझने में, मैं सक्षम नहीं थी। खैर, अनाथालय में मेरी परवरिश शुरू हुई। वहां के सुप्रीटेंडेंट और हेल्परों ने ही मेरी परवरिश की। धीरे-धीरे मैं बड़ी हो गई। सोचने-समझने की शक्ति आ चुकी थी। तब पता चला कि मेरे साथ ऐसा हुआ। मेरे मां-बाप ने मुझे पैदा होने के बाद सड़क पर मर जाने के लिए फेंक दिया था, लेकिन हाय री मेरी किस्मत मैं मरी भी नहीं, अगर मर जाती तो शायद मेरे माता-पिता की कोशिश तो कामयाब होती...
         समय की ठोकरों ने बहुत कुछ सिखा दिया था। बड़े होने पर ठान लिया अब तो जिंदगी की जंग जीतनी ही है। किसी भी हालत में अपनी तकदीर को बदलना है। खूब मन लगाकर पढ़ाई की। धीरे-धीरे क्लास दर क्लास मैं आगे बढ़ती गई। दसवीं, बारहवीं में अव्वल रही फिर सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में नाम कमाने की ठान ली। मैं अपनी मेहनत और किस्मत के बल-बूते आगे बढ़ती गई। कॉलेज में कैम्पस सिलेक्शन में भी मुझे अच्छी नौकरी मिल गई। मैं अंधेरी की सॉफ्टवेयर कंपनी में घाटकोपर से रोज अप-डाउन करने लगी। ट्रेन में ही मेरी पहचान मनोज से हुई। मनोज रोज मिलता था, पर कभी बात नहीं होती थी। वो रोज मेरी तरफ देखकर मुस्कराते और मैं भी। एक दिन मुझे स्टेशन पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रेंगने लगी और मैं ट्रेन में चढऩे के दौड़ी रही थी, इतने में ही मनोज ने हाथ बढ़ाया और मुझे अंदर खींच लिया। उस दिन हमारे रिश्ते की नींव पड़ी। मेरे दिल में किसी अंजान से रिश्ते के छींटे पड़ चुके थे। मन थोड़ा बहुत खुश था और असहज भी।
                 खैर लोकल में अन्य लोग ज्यादा समय नहीं देते और वैसा ही हुआ अगले स्टेशन पर उतरने वालों ने हमारे मन में लगातार आ रहे बहुत से ख्यालों पर विराम लगा दिया और बहुत सारे धक्के लगने लगे। मनोज ने मुझे फिर सहारा दिया और हमें जैसे-तैसे अंदर बैठने की जगह मिल गई, क्योंकि कुर्ला स्टेशन आ चुका था। ऑफिस तक का सफर काफी लंबा था, तो उस दिन हमने बहुत सारी बातें कीं। तब पता चला कि उसका ऑफिस मेरे ऑफिस के पास ही है। शाम को मिलना तय हुआ। साथ-साथ वड़ा पाव खाते-खाते ऑफिस से स्टेशन गए। साथ-साथ ही ट्रेन भी पकड़ी। अब यह रोज का सिलसिला हो चला था। धीरे-धीरे प्यार गहरा हो चुका था। वीकेंड कभी मरीन ड्राइव, गेट ऑफ इंडिया तो अन्य स्थानों पर गुजरने लगी, डिनर साथ-साथ ही करते थे। मनोज के रिश्ते के सिवाय मुझे किसी और रिश्ते का अहसास न होने के कारण वो मुझे जान से प्यार हो गया था। एक दिन वो मुझे अपने घर पर ले गया, मुझे अपने घर पर मिलवाया। मैं उस दिन बहुत डरी हुई थी। आंटी ने मुझसे वो ही पूछ लिया, जिसका मुझे डर था। अनाथ शब्द एक बार फिर मेरे सामने खड़ा था। उनकी आंखों में मेरे नाजायज, जायज और तथाकथित सामाजिक सरोकारों से जुड़े सवाल तैरते दिखाई देने लगे थे। उसके बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होने लगा, फिर मनोज ने महौल को संभाला और मुझे लेकर  बाहर आ गया। मनोज ने मुझे समझाया कि वो अपनी मां को मना लेगा, पर मां कहां मानने वाली थीं। उनका विरोध जस का तस रहा, मनोज के पापा को कोई परेशानी नहीं थी। धीरे-धीरे मेरा उसके घर आना-जाना बढ़ गया। मुझे लगने लगा था कि मैं मनोज की मां के दिल मैं जगह बना लूंगी। पापा ने तो मुझे बहू के रूप में स्वीकार ही लिया था। एक दिन मम्मी ने भी पीला सिग्रल दिखा दिया। मुझे लगने लगा था कि अब मेरे भी घर होगा। मेरे भी अपने रिश्ते होंगे, जो मैंने खुद बुने हैं। एक दिन रोज की तरह 8:57 की लोकल पकडऩे के लिए मैं घर से निकली। इतने में ही मेरे फोन की घंटी बजने लगी, स्क्रीन पर मनोज था मैंने तुरंत अपनी घड़ी देखी, मैं आज लेट थी। मैंने मनोज से कहा कि मैं बस दो मिनट में पहुंच रही हूं। जल्दी-जल्दी स्टेशन पर पहुंची। देखा तो स्टेशन के जीने पर बहुत भीड़ थी। मैं जल्दी-जल्दी जीने से उतरने लगी। मैं आधे जीने पर ही थी कि ट्रेन रेंगने लगी। मनोज गेट पर मुझे थामने के लिए आ चुका था। मैं प्लेटफॉर्म पर दौड़ी, उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया। मुझे पूरा भरोसा था कि वो मुझे अपनी बाहों में समेट लेगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जल्दीबाजी में मेरा पैर डोर स्टेप पर न जाकर, प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच में चला गया। मनोज ने मुझे खींचने की बहुत कोशिश की पर वो न कर सका और मैं ट्रैक पर गिर पड़ी। स्टेशन पर चीखपुकार मच गई। ट्रेन रुकने के बाद मुझे बाहर निकाला गया। जब अस्पताल में मेरी आंख खुली तो जिंदगी पूरी तरह बल चुकी थी। मेरे दोनों पैरों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया था। ट्रैक पर फंसने के कारण दोनों पैरों की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं और डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान दोनों पैरों को काट दिया और जिंदगीभर के लिए बैसाखियां पकड़ा दीं। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब मैं फिर 8:57 की ट्रेन पकडऩे वहां पहुंची तो उसी ट्रेन से रोज जाने वाले लोग तो थे, पर मनोज नहीं था। वो मुझे फिर कभी नहीं मिला। मेरी जिंदगी एक बार फिर वीरान हो चुकी थी। इससे अच्छा तो यह होता कि जब मुझे मेरे मां-बाप ने सड़क पर फेंका था, मैं तब ही मर जाती।
         सच ही है, जल्दी ट्रेन पकडऩे की चाह रखने के चलते कई मुंबईकरों को कुछ इसी तरह जिंदगी भर का गम मिलता है। समय से आगे निकल जाने की इच्छा, हमें कोसों पीछे धकेल देती है। इसके विपरीत इस शहर की एक खासियत और है कि वो कभी हारने नहीं देता। मैं आज भी 8:57 की ट्रेन से ऑफिस जाती हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि साधारण डिब्बे की जगह विकलांगों के डिब्बे में।

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

आखिर कब तक सहोगे


सुबह की पहली किरण जैसे ही गुडिय़ा के मुंह पर पड़ती है, वह करवट बदलकर तकिए के नीचे सिर छुपा लेती है। वहीं दूसरी ओर मां जोर से आवाज लगाती है, गुडिय़ा ओ गुडिय़ा... चलो उठो कोचिंग नहीं जाना क्या? गुडिय़ा कोई जवाब नहीं देती। इतने में बड़ा भाई आकर ताकिया खींच लेता है। गुडिय़ा फिर भी नहीं उठती, वह जैसे ही चादर खींचने के लिए आगे बढ़ता है, छोटा भाई मोहित उसे रोक देता है। घर में मची भगदड़ देख हर मिडिल क्लास फैमिली की तरह, मां डांटना शुरू कर देती है। अब गुडिय़ा चुपचात उठकर अपना बिस्तर ठीक करने के बाद वहां से चली जाती है। मोहित भी बड़े भाई से कहता है कि चलो भैया क्योंकि यहां तो टेप रिकॉर्ड शुरू हो गया है।  मां इनकी बातों को सुनकर भी अनसुना कर देती है। शर्मा जी यानी की गुडिय़ा के पापा मॉर्निंग वॉक के बाद घर वापस आ जाते हैं। आते ही पत्नी को समझाते हैं कि भागवान बच्चे हैं शैतानियां तो करेंगे ही, उसमें इतना नाराज होने की क्या बाता है? मां का गुस्सा भी शांत हो जाता है। इसके बाद पूरा परिवार साथ बैठकर चाय पीता है। मां गुडिय़ा को सुबह जल्दी उठने की सलाह देती है। साथ ही याद भी दिलाती है कि मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारी कोचिंग के पास ही सांई बाबा का मंदिर है, वहां रोज जाया करो। गुडिय़ा तपाक से जवाब देती है अब से रोज जाऊंगी मां। चाय खत्म होते ही सब अपने-अपने काम में लग जाते हैं। पापा ऑफिस जाने की तैयारी करने लगते हैं। बड़ा भाई अपने क्लाइंट्स से फोन पर बातें करने लगता है, मोहित कॉलेज जाने के लिए तैयार होता है। गुडिय़ा भी अपने रुटीन के मुताबिक कॉलेज के लिए निकल जाती है। हर मध्यमवर्गीय परिवार की तरह मां दिनभर कामकाज में लगी रहती है। मां के जहन में कभी बच्चों की पढ़ाई कभी उनकी शादी और तो कभी इनकी तबीयत के खयाल आते रहते हैं। गुडिय़ा की चिंता मां को कुछ ज्यादा ही थी, क्योंकि वो उसको सबसे ज्यादा प्यार करती थी। उसकी शादी के लिए भी लड़कों की तलाश उसने शुरू कर दी थी। दोपहर होते-होते गुडिय़ा घर वापस आ जाती है। खाना और फिर थोड़ी देर आराम के बाद कोचिंग के लिए बैग उठाते ही मां उसे कोचिंग के बाद सांई बाबा मंदिर जाने की याद दिलाती है। रात आठ बजे गुडिय़ा कोचिंग से फ्री होती है, अब उसे मां की सलाह याद आ जाती है। वह अकेले मंदिर के लिए निकलती है। सड़क पर काफी तेजी से गाडिय़ां दौड़ रही थीं। अंधेरे को देखते हुए गुडिय़ा के मन में कुछ पल के लिए ख्याल आता है कि घर में झूठ बोल दूंगी कि मंदिर हो आई और बाबा को यहीं से नमस्कार, लेकिन अगले ही पल उसकी आस्तिकता आड़े आ जाती है। वह चल पड़ती है मंदिर के लिए। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे अहसास होता है कि कुछ बाइक सवार उसका पीछा कर रहे हैं। वह तेज चलना शुरू कर देती है, बाइक सवार चार लड़के अभी भी पीछे-पीछे आते रहते हैं। थोड़ी ही देर बाद बदमाश उसके चारों ओर बाइक घुमाने लगते हैं। यह सारा तमाशा भीड़भाड़ वाली सड़क पर चल रहा था। गुडिय़ा मदद की नजरों से सड़क चलते लोगों की ओर देखती है, लेकिन कोई आगे नहीं आता। गुडिय़ा किसी तरह उनको चकमा देकर वहां से निकलकर एक अखबार के दफ्तर में घुस जाती है। बदमाश वहां भी आ धमकते हैं। जैसे ही बदमाशों को पता चलता है कि यह अखबार का दफ्तर है, वो वहां से खिसक लेते हैं।
                उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। घबराई, सकपकाई गुडिय़ा आपबीती पत्रकारों को बताती है। मीडियाकर्मी आनन-फानन में पुलिस कंट्रोल रूम फोन लगाते हैं। नजदीकी थाने को भी जानकारी दी जाती है। वायरलैस पर मैसेज दौड़ते ही आनन-फानन में पुलिस की गाडिय़ां पहुंचती हैं। इतने में गुडिय़ा घर पर भी सूचना कर देती है। पुलिस के पीछे-पीछे उसके भाई भी पहुंच जाते हैं। सारी कहानी सुनकर भाइयों को बहुत गुस्सा आता है। वो उसे वहां से ले जाते हैं। मीडिया के दबाव के चलते देर रात तक बदमाश पकड़े जाते हैं। अगले दिन गुडिय़ा को पहचाने के लिए बुलाया जाता है, लेकिन गुडिय़ा बदमाशों को पहचानने से मना कर देती है, जबकि एक रात पहले उसने दावा किया था कि वह बदमाशों के पहचानती है। यह बात सुनकर पुलिस कप्तान और पत्रकार दोनों परिजनों से संपर्क साधते हैं और कारण पूछते हैं। वहीं पुराना घिसा-घिसाया जवाब मिलता है, हम मिडिल क्लास फैमिली के लोग हैं। पुलिस के चक्करों में हमें नहीं पडऩा, इससे हमारी बेटी के बदनामी होगी। इतना कहकर फोन काट दिया जाता है। मामला ठंडा पड़ जाता है। पुलिस और मीडिया अपना ध्यान हटा लेते हैं।

                   गुडिय़ा या उसके घरवाले उन बदमाशों के खिलाफ मामला दर्ज करवाते तो उनको जरूर सजा मिलती। अब उन बदमाशों के हौसले और बुलंद हो गए होंगे, क्योंकि उनको पता है कि मामला दर्ज करवाने की हिम्मत कोई नहीं जुटाता। पुलिस भी यह जानती है कि जब मामला दर्ज होगा ही नहीं तो हम भी ज्यादा गंभीर क्यों हों, ले-देकर मामला सलटा लो। दरअसल हम जब तक ऐसे अपराधों के खिलाफ पुरजोर आवाज नहीं उठाएंगे तब तक यह रुकने वाला नहीं। या यूं कहें कि शायद गुडिय़ा या उसके जैसे अनेकों परिवार उस दिन का इंतजार कर रहे हैं कि जब उनकी बेटियों के बीच-बजार कपड़े फाड़े जाएंगे, लेकिन अब और तब में फर्क सिर्फ इतना होगा कि अभी मामला दर्ज करवाया नहीं और तब मामला मेेडिकल के बाद खुद-ब-खुद दर्ज हो जाएगा।

मंगलवार, 19 जून 2012

नहीं करनी शादी

कूप्रथाओं और भारतीय समाज का चोली दामन का साथ रहा है। यह कालिख न जाने कितनी महिलाओं के जीवन को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल चुकी हैं।और तो और यह सोचकर आश्चर्य होता है कि किसी हद तक आज भी हमारे समाज में ये अपनी जड़ें जमाए हुए हैं, हां फर्क इतना जरूर है कि अब नारी ने अपनी आवाज मुखर करना शुरू कर दिया है। घटना राजस्थान की है...
                                           अजमेर (राजस्थान) से लगभग 50 किलोमीटर दूर सूरजपुरा गांव में रेखा रहती थी। पड़ोस में ही उसका दोस्त दिलीप भी रहता था। गांव की परंपरा के अनुसार पड़ोसी मतलब पहला रिश्तेदार था, इसलिए दोनों परिवारों में आत्मीय प्रेम था। रेखा और दिलीप दोनों साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और खूब सारा समय साथ बिताते थे। दोनों एक-दूसरे को अपना बहुत अच्छा दोस्त मानते थे। बचपन में एक दिन दिलीप नदी में नहाने अपने दोस्तों के साथ गया। इस बात का रेखा को भी पता चल गया था। न जाने क्यों दिलीप का दोस्तों के साथ यूं जाना उसे अच्छा नहीं लगा। रेखा ने नदी पर जाकर दिलीप को वापस लाने की ठान ली और वह निकल पड़ी नदी के लिए। वहां पहुंचकर उसकी आंखों के सामने ही दिलीप का पैर अचानक नदी के किनारे चिकनाई के कारण फिसल गया और पत्थरों से टकराता हुआ वह अचानक नदी की मुख्य धारा में पहुंच गया। यह पूरा घटनाक्रम पलक झपकते ही घटा और अगले ही पल रेखा ने भी नदी में छलांग लगा दी। नदी के बहाव को काटते हुए बहादुर लड़की ने दोस्त का दामन थाम लिया और दोस्त को काल के गाल में जाने से बचा लिया। ये देखकर दिलीप के दोस्त भी सन्न रह गए। घर वापस आते ही रेखा ने पूरी कहानी अपने और दिलीप के घर पर बताई। दिलीप को उसके बापू ने बहुत डांटा और मां ने रोते-रोते दो चार झांपड़ भी लगा दिए। लाड़-प्यार से पला-बड़ा जिगर का टुकड़ा जो था। उधर, रेखा के घरवालों का सीना फक्र से चौड़ा हो रहा था। उनकी बेटी ने कुछ काम ही ऐसा किया था। अब पूरे गांव में दोनों के दोस्ती के चरचे हो रहे थे। इस घटना के बाद रेखा दिलीप और भी ज्यादा करीब आ गए। दोस्ती के इस रिश्ते में प्रेम और स्नेह चरम पर था। रेखा को दिलीप के बिगडऩे का डर था। वो उसके कुछ दोस्तों को बिलकुछ पसंद नहीं करती थी। दिन पर दिन साल पर साल बीतते चले गए। आठवीं कक्षा की ही बात है एक दिन रेखा ने दिलीप को दोस्तों के साथ गांजा पीते देख लिया। यह सब उसे नागवार गुजरा और दिलीप को उसने थप्पड़ मार दिया। दिलीप बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। काफी देर बाद जब होश आया तब दिलीप रेखा के साथ घर पहुंचा। रास्ते में उसने वायदा किया कि अब वो कभी नशा नहीं करेगा। कुछ समय बाद आठवीं का रिजल्ट आया, जिसमें दिलीप फेल हो गया था। वो एक बार फिर नशा करने लगा। दोस्त के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माना। बुरी संगत के कारण वो लगातार पढ़ाई में पिछड़ रहा था। रेखा हर बात की जानकारी अपने और उसके घरवालों को देती थी। अब रेखा गांव छोड़कर आगे की पढ़ाई करने अजमेर आ गई। सोफिया कॉलेज में बमुश्किल मिले दाखिले को उसने एक अवसर की तरह समझा और खूब मन लगाकर पढ़ाई की। तीन साल बाद ग्रेजुएशन पूरा कर जब वो घर पहुंची तो परिवार के सब लोग बहुत खुश थे। पूरा एक दिन परिवारवालों के साथ गुजरा। अगले दिन रेखा जब चाय पी रही थी, तब उसके बापू ने उसे बताया कि उसकी शादी तय कर दी गई है। रेखा वहां से शर्माकर चली गई, पिताजी ने इसको मूक सहमति समझा। मां से जब पूछा तो पता चला कि उसकी शादी तो बचपन में ही तय कर दी गई थी, दिलीप के साथ। यह सुनकर रेखा हैरान थी। जिस मां-बाप ने उसे सोचने-समझने लायक बनाया, उन्होंने ही उसके जीवन के सबसे बड़े फैसले की नींव उससे बिना पूछे डाल दी। कई सारे सवाल दिलो-दिमाग में कौंध रहे थे। इस बात को रेखा बिलकुल भी पचा नहीं पा रही थी। घर में खुशी का माहौल था। सब लोग शादी की तैयारी में लगे थे। इस बीच एक दिन दिलीप मिलने आया। रेखा ने उसे समझाया कि उनके बीच सिर्फ अच्छी दोस्ती है। इस पर दिलीप नाराज होकर चला गया। रेखा ने भी हिम्मत जुटा कर घर में कह दिया कि उसे यह रिश्ता मंजूर नहीं, क्योंकि दिलीप उससे कम पढ़ा-लिखा है और नशा भी करता है। रेखा के बापू ने दो दिन तक खाना नहीं खाया। पूरे घर में मुर्दनी सी छा गई। देर सवेर मां के समझाने पर  रेखा के बापू को समझ में आ ही गया कि वो ठीक नहीं कर रहे। उनकी बच्ची को कहीं ज्यादा अच्छा घर मिल सकता है, क्योंकि वो ज्यादा योग्य है। बापू ने दिलीप के पिता को हाथ-जोड़कर रिश्ता कर पाने में असमर्थता जताई। इस बात पर दिलीप के पिता को गुस्सा आ गया और उन्होंने परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि ये शादी तो होकर रहेगी। नहीं तो तेरी बेटी जिंदा नहीं बचेगी। ये सिर्फ हमारा नहीं पूरी बिरादरी और परंपराओं का सवाल है। आज तुम मना कर रहे हो, कल किसी और की हिम्मत होगी, जबान दी तो दी। ऐसे तो हमारे समाज की सूरत ही बदल जाएगी। रेखा के बापू ने खोखली परंपरा को तोडऩे की प्रार्थना की, लेकिन उनकी किसी ने एक न सुनी। गांव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने भी परंपराओं का हवाला देते हुए हर हाल में शादी कराने को कहा। अब रेखा के पिता बहुत बेबस थे। एक तरफ बेटी थी तो दूसरी तरफ समाज। बापू को इस हालत में देखकर रेखा ने खुद ही इन परिस्थितियों ने निपटने की ठान ली। अगले दिन फिर पंचायत होनी थी। बापू के पीछे-पीछे वो भी पहुंच गई। दोनों को देखकर गांव में जबरदस्त तनाव था। पंचायत ने शादी की तारीख तय की। रेखा ने भरी पंचायत में शादी से इनकार कर दिया। लोग उग्र हो गए और रेखा पर हमला बोल दिया, तेजाब उछाला गया। रेखा ने बचपन में सीखी लाठी के दम पर सबका डटकर मुकाबला किया। किसी तरह वो खुद और बापू को बचाकर घर ले आई। चोटें लगीं जरूर, लेकिन मात्र शरीर पर, मन सशक्त हो गया था। रेखा ने गांव में बदलाव की पहली जंग जीत ली थी। अगले दिन पौ फटते ही दरवाजे पर पत्थर फिकने लगे। आग के गोले भूसे की छत पर फेके जाने लगे। मां-बाप बुरी तरह घबरा रहे थे। रेखा ने हिम्मत न हारते हुए पीछे की दीवार तोड़कर सब को घर के बाहर निकाला और सीधे जा पहुंची मजिस्ट्रेट के सामने। मजिस्ट्रेट साहब ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई। साथ ही आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस को आदेश दिया। कुछ ही दिनों बाद आरोपी गिरफ्तार हुए और कानून ने उन्हें उनको सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस तरह रेखा ने समाज में बदलाव को जन्म दिया और नारी होने का फर्ज निभाया।

सोमवार, 4 जून 2012

तुम लड़की हो

मां एक बात कहूं,
बोलो बेटा
मोहल्ले के कुछ लड़के आते-जाते मुझे परेशान करते हैं। मुझे बहुत खराब लगता है। पापा से कहूं क्या?
रहने दो, तुम ध्यान मत दो। पर मां...
पीछे खड़े पापा भी सब सुन लेते हैं।
पापा भी सलाह देते हैं। अपना रास्ता बदल दो। ध्यान मत दो। रोके तो रुको ही मत। सीधे निकल जाओ। फालतू लोगों की बातों पर क्या ध्यान देना।
नहीं, अगली बार उसने कुछ कहा न तो मैं दो चांटे रसीद कर दूंगी।
तुम पागल हो गई हो क्या, उसने बाद मैं कुछ किया तो। तुम समझती क्यों नहीं हो, तुम लड़की हो। पर मां...
यह पढ़कर आपको कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा, पर मध्यमवर्गीय शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियों की लगभग यही कहानी है। वहीं बड़े शहरों में लड़कियां बिंदास बाहर तो निकलती हैं, पर सहना तो उनको भी पड़ता है। छेड़छाड़, फब्तियां आदि को तो नजरअंदाज करना आदत में ही डालना पड़ता है। और खास बात यह ही हमारा समाज आज भी इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए चुप रहना और सहन करना लड़कियों के चारित्रिक गुण बताकर अपने स्वभाव शामिल करने की सलाह देता है। साथ ही कल तुम ससुराल जाओगी तो क्या... वाला डायलॉग भी सुनाय जाता है। कपड़े पहनने से लेकर-कपड़े सुखाने तक, खाना पकाने से लेकर-खाना खाने तक और घर से बाहर निकलने से लेकर-घर आने तक, हर जगह बार- बार एक लड़की को लड़की होने का अहसास कराया जाता है। हालाकि स्त्री के दामन पर दाग अच्छे नहीं लगते, लेकिन दामन को बचाने से बेहतर है मैला करने वालों का सफाया करना। कुछ ऐसा ही किया मेरी दोस्त अस्मिता ने।
                        ग्वालियर के साइंस कॉलेज में उसका पहला दिन था और पहले ही दिन कुछ अजीब से घटा। कॉलेज के जाने-माने लड़के रॉकी की निगाहें अस्मिता पर पड़ गईं। फूल और कांटे के जमाने में रॉकी भी खुद को अजय देवगन समझ रहा था। अस्मिता के इंतजार में कॉलेज के गेट पर ही बैठा रहता था। जैसे ही अस्मिता गेट पर पहुंचती वो सामने आकर खड़ा हो जाता। अचानक उसको सामने देखकर अस्मिता की रूह कांप जाती थी। रॉकी उससे कई सवाल करता था, हर सवाल को वो टाल जाती थी (तुम कहां रहती हो, तुम्हारा पूरा नाम क्या है, वगैरह-वगैरह)। अब यह रोज की बात बन गया था। अस्मिता को कॉलेज का गेट देखते ही डर लगने लगता था, मन मैं सिर्फ एक ही ख्याल आता था, बस यहीं कहीं बैठा होगा लफंगा, गुंडा कहीं का, बदतमीज। पर बड़ों के बताए रास्ते पर चलते हुए अस्मिता हर बात सहन कर रहती थी। मन ही मन उसे बुरा भी लगता था, क्योंकि अब तक उसे सारा कॉलेज जानने लगा था। उसे देखकर सब लोग कहने लगे थे, अरे ये ही है वो जिसके पीछे रॉकी पड़ा है। अरे भाभीजी आ गईं। यह सब सुनकर अस्मिता का मन बहुत उदास हो जाता था। उसने कॉलेज की टीचर्स से भी कहा, तो उन्होंने भी उसे ध्यान न देने के लिए कहा, रास्ता बदने के लिए कहा। अब तक रॉकी की बदतमीजी काफी बढ़ गई थी। कॉलेज के छात्र संघ का अध्यक्ष होने के कारण उससे कोई कुछ नहीं कहता था और जो कहना चाहते थे वो सब अस्मिता को सलाह देते थे, बेटा तुम ध्यान मत दो तुम लड़की हो। समाज उसे उस बात की सजा दे रहा था जो उसने किया ही नहीं। अब तक रॉकी की बदतमीजी और भी बढ़ गई थी। फिल्मी हीरो की तरह रॉकी दूसरी मंजिल पर पढ़ रही मेरी दोस्त को नीचे से जोर-जोर से आवाज लगाकर बुलाता था। टीचर्स तक कहने लगे थे, अस्मिता सुनलो वो तुम्हे बुला रहा है। मेरी दोस्त कहती मुझे उससे बात नहीं करनी सर। तो टीचर्स कहते, बेटा सुन लो नहीं तो वो और चिल्लाएगा, तुम फालतू में ही बदनाम हो रही हो। नीचे आने पर हर बार की तरह मुझे तुम से कुछ कहना है, कि रट्ट लगा देता था। पर कह नहीं पाता था। साथ ही यह भी कहता था तुम क्लास में मत जाया करो मैं नंबर बढ़वा दूंगा, प्रेक्टिकल मत दो मैं सब करवा दूंगा, किसी से कोई परेशानी हो तो बताओ।
                          एक दिन रॉकी का फोन अस्मिता के घर पर आया, रॉकी ने उसको धमकी भरे अंदाज में कहा तुम सफेद कपड़ों में मत आया करो। सब तुमको ही देखते रहते हैं और ये मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। अस्मिता ने फोन पटक दिया। वो रोज-रोज की झंझट से तंग आने लगी थी। धीरे-धीरे दिन पर दिन और महीने पर महीने बीत गए। अब तक अस्मिता का गुस्सा बहुत बढ़ गया था। पर तुम लड़की हो वाली बात उसे कहीं न कहीं रोकती थी। फिर एक दिन वो जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। साल के आखिरी दिन था प्रेक्टिकल चल रहा था। अस्मिता अपनी सहेलियों के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। उसी समय रॉकी का दोस्त आया और कहा कि भाभी आपको रॉकी बुला रहा है। अस्मिता ने कहा अगर मुझ से बात करनी है तो उससे कहो यहां आ जाए, नहीं तो चपरासी की तरह वहीं बैठा रहे। थोड़ी देर से रॉकी आया और क्लास में सब के सामने अस्मिता से कहा बाहर आओ मुझे कुछ बात करनी है। इस पर अस्मिता ने कहा, यहीं कहो जो कुछ कहना है। अब अस्मिता में डर नहीं था। इसके बाद रॉकी ने जैसी ही फिर से बाहर चलने को कहा, अस्मिता ने सब के सामने उसके गाल पर दो चांटे रसीद कर दिए। सब दंग थे, छात्र संघ अध्यक्ष को चांटा। रॉकी गाल पर हाथ रखकर चला गया। उसके जाते ही सब लड़कियों के चेहरे पर जीत की खुशी थी। लड़के भी उसके हौसले से उत्साहित थे। सर ने भी उसको जगह पर बैठाने के बहाने पीठ थपथपा दी। थोड़ी देर बाद वो सर से इजाजत लेकर घर चली गई। उसने सारी कहानी मां को बता दी। मां भी डर गई, लेकिन उसने मां से कहा, मां डरो मत अब मैं डटकर मुकाबला करूंगी। अब बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे लड़की होने का लोग नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कुछ दिन बाद कालेज पहुंची अस्मिता को कालेज का माहौल बदला-बदला लगा रहा था और रॉकी भी सुधर चुका था।
                 इससे एक बात साफ होती है, हम लड़कियां जरूरत से ज्यादा बर्दाश्त करेंगी तो कहीं ज्यादा बर्दाश्त करना होगा। हो सकता है कि नजरअंदाज करने की आदत का लोग गलत फायदा उठाएं। इस कारण मेरा तो यही मानना है कि एक नियत समय के बाद आक्रमण ही सही होता है। बस समय का चुनाव आपको करना है।

बुधवार, 30 मई 2012

डाकू नहीं विदेशी पक्षियों की गैंग



         आज से लगभग दो साल पहले मैं इंदौर में था। इंदौर पीपुल्स समाचार के समूह संपादक ने एक दिन कहा कि तुम्हारा ट्रांसफर ग्वालियर कर दिया गया है। आपको तीन दिन बाद वहां जॉइन करना है। मैंने भी राहत की सांस ली, क्योंकि एकाकी जीवन से मैं उक्ताने लगा था और कुछ दिन पहले तक घर के आसपास जाना भी चाहता था। तो जहन में मध्यप्रदेश का एक ही शहर आता था, ग्वालियर। हालाकि जब ट्रांसफर हुआ तब तक मैं पुन: इंदौर में ही फिर नए जोश के साथ काम करने का मन बना चुका था। खैर ये अलग बात है, क्योंकि हम जब जो चाहते हैं, हमें वो नहीं मिलता। ग्वालियर ट्रांसफर की बात सुनते ही मन में चंबल के बीहड़ और डाकुओं की कहानियां कौंधने लगीं थीं। लगभग मार्च २०१० में, मैं ग्वालियर आ गया और कुछ ही महीने बाद राजस्थान पत्रिका जॉइन कर लिया। डाकुओं, बदमाशों से मुठभेड़ और गोलियों की आवाज तो यहां के लोगों के लिए आम बात थी। खासकर भिण्ड और मुरैना में रहने वालों के लिए। यहां आकर पता चला कि चंबल नदी को स्थानीय भाषा में चामिल कहते हैं। मेरे साथ काम करने वाले श्री अनिल श्रीवास्तव ने एक कहावत सुनाई एक लोटा चामिल को पानी और सौ मुलक को घी। तब से ही चंबल के पानी की इस तासीर की अनुभूति की तीव्र इच्छा मन में उत्पन्न हो गई। और एक दिन अपने काबिल दोस्त महेन्द्र राजौरे और प्रवीण पांडेय के साथ जा पहुंचा चंबल की सैर करने। प्रदेश सरकार ने चंबल सफारी के लिए यहां कुछ नावों का इंतजाम किया है। यहां आकर मालू हुआ कि देश का एकमात्र सबसे बड़े जलीय जीव अभयारण्य है चंबल का यह गलियारा। श्योपुर से लेकर भिण्ड तक के गलियारे में ढेरों घडिय़ाल, मगरमच्छ और डॉलफिंस हैं। साथ ही चंबल  के साथ बीहड़ की सुंदरता और शांतता के कारण यहां जनवरी से लेकर अप्रैल तक विदेशी पक्षी भी आते हैं। इन दिनों चंबल का यह पूरा गलियारा विभिन्न प्राणियों की चहचहाहट और कलरव से गूंज उठता है। बीहड़ को टकराकर आने वाली विदेशी पक्षियों की आवाज मन में जोश भर देती हैं। लाइफ जैकेट पहनकर हम सभी लोग बोट में बैठ गए। चंबल का पुल पार करते ही नाव फर्राटे भरने लगी। अब चामिल की विशालता का अनुभव होने लगा था। चामिल की ठंडी-ठंडी बूंदे रोमांच बढ़ा रहीं थीं। बड़े-बड़े घडिय़ाल और मगरमच्छ बिलकुल साफ और बहुत पास नजर आ रहे थे। छोटे से टापू पर बैठे घडिय़ालों के झुंड हमारी हलचल महसूस करते ही पुन: पानी में चले गए। उस समय हमको तो ऐसा लगा मानो वो हम पर ही हमला करने के लिए आगे बढ़ रहे हों। पानी में एक अजीब से हमचल थी। मेरे दोस्त महेन्द्र ने बोट चालक से कहा भाई यहां से चलो वो सब हमारी तरफ ही आ रहे हैं। जैसे ही वहां से आगे बढ़े तो वो दृश्य देखने को मिला जो बहुत कम लोगों को मिलता है। एक छोटा शिकारी, पक्षी का शिकार कर रहा था। घात लगाकर बैठे घडिय़ाल ने पलक झपकते ही विदेशी पक्षी को अपने मुंह में कस लिया और गर्दन अलग कर दी। नैसर्गिक क्रूरता भी यहां आकर ही देखने को मिली। चामिल का पानी एक अजीब से रोमांच का अहसास करा रहा था। अब हम वापस उस स्थान की ओर जा रहे थे, जहां से हम बोट में सवार हुए थे। जैसे ही यहां पहुंचे तो देखा रंगून से आया पक्षियों का जोड़ा गुनगुनी धूप के कारण चमकते पानी में गोते पे गोते लगा रहा था। आसपास खड़े मिट्टी के पहाड़ डाकुओं की जगह चंबल की सुंदरता बढ़ाते नजर आ रहे थे। नदी के ऊपर से गुजरे पुल पर दौड़ते हजारों वाहन बदलते दौरे की गवाही दे रहे थे। अब दुर्दांत डाकुओं की बातें बेकार महसूस होने लगी थीं। तब ऐसा लगा न जाने क्यों लोग पुरानी धारणाओं से उबर नहीं पाते। पर्यटन और रोमांच की तलाश में न जाने कहां-कहां जाते हैं और चंबल को भूल जाते हैं। किसी ने सही कहा है हीरे हमारे पैर के नीचे ही पड़े होते हैं और हम उसकी तलाश में जाने कहां-कहां भटकते हैं या यूं कहें कि हम खुद उन्हें खुद से दूर कर लेते हैं। मैं अपनी निजी जिंदगी की बात करूं तो कुछ शब्द इस सैर के बाद पुन: याद आ गए- प्रयोगवादी बनो न कि परंपरावादी। चीजों को नए तरीके से देखने और समझने का बीड़ा उठाओ तभी जीवन बदलेगा, नहीं तो उबाऊ हो जाएगा।