(बाल जगत)
ये कहानी है रायबरेली के दक्ष और अथर्व की है। दोनों पक्के दोस्त थे। सब लोग दक्ष को प्यार से बिल्लू और अथर्व को कुक्कू बुलाते थे। बिल्लू पढऩे में होशियार था, जबकि कुक्कू सामान्य। बिल्लू को इस बात पर घमंड था, क्योंकि उसको क्लास में हमेशा ही शाबाशी मिलती थी। सब लोग उसे कुक्कू से ज्यादा तवज्जो देते थे, लेकिन कुक्कू के बातचीत के ढंग के सभी मुरीद थे, परन्तु टीचर बिल्लू की ज्यादा तारीफ किया करती थीं। धीरे-धीरे दोनों बड़े हुए। बिल्लू हमेशा कुक्कू से एक कदम आगे ही रहा। इस कारण कुक्कू के परिवार वाले हमेशा बिल्लू से कुक्कू की तुलना किया करते थे। कॉलेज तक दोनों ने साथ-साथ ही पढ़ाई की। अब तक कुक्कू ने अपना सामाजिक दायरा काफी बढ़ा लिया था। वहीं बिल्लू पढ़ाई में मस्त रहता था। कुक्कू की मां इस बात से काफी परेशान रहती थी। वो कुक्कू को बार-बार समझाती थी कि समाज में ज्यादातर लोग तुझे जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि सब तुझे पसंद ही करते हैं। अरे पढ़-लिख जाएगा तो सब सलाम ठोकेंगे, तारीफ करेंगे नहीं तो सब लोग पीठ-पीछे तेरी नहीं, हमारी बुराई करेंगे। कुक्कू को मां की यह बातें काफी बुरी लगती थीं, लेकिन वो भी क्या करे उसका मन पढ़ार्ई में ज्यादा न लगता था। परिस्थितियां बदलने के साथ-साथा कुक्कू और बिल्लू की राह भी बदल गई। बिल्लू पढऩे के लिए रायबरेली छोड़कर लखनऊ निकल गया, जबकि कुक्कू रायबरेली में रहा। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे कम होने लगी। लगभग पूरा दिन साथ बिताने वाले दोस्त अब कभी-कभी ही बात करते थे। कुक्कू को बिल्लू की बहुत याद आती थी। वहीं बिल्लू अपने नए दोस्तों में मस्त हो चुका था। एक बार किसी काम से कुक्कू लखनऊ गया तो उसने सोचा क्यों न बिल्लू से भी मिल लिया जाए। वो बिल्लू से मिलने उसके कॉलेज गया, लेकिन बिल्लू ने पहचान तक न दिखाई। बिल्लू अब शहरी हो गया था। बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगा था। बिल्लू अपनी मां की बात (बेटा चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ पर पैर जमीन पर ही रहने देना) को पूरी तरह भूल चुका था। कुक्कू बुरी याद लेकर वापस लौट गया। वापस घर जाते समय, कार में उसके पहचान वाले ने उससे पूछा- क्योंï, मिल आए अपने दोस्त से? तो उसने बुझे मन से कहा, हां मिल आया। कुक्कू का साथी (बड़ी राजनीतिक पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष) सब समझ गया और उसने कहा कि दोस्त चिंता मत करो वक्त सब का आता है। अब दोनों की दोस्ती लगभग खत्म हो चुकी थी। बिल्लू की होशियारी के किस्से कुक्कू को बीच-बीच में मिलते रहे। इसी बीच बिल्लू को एक बड़ी कंपनी से बड़ा सा ऑफर मिला। लखनऊ में छह महीने की ट्रेनिंग के बाद मुंबई जॉइन करना था।
अब समय करवट लेने वाला था और इसी दिन का इंतजार कुक्कू को भी था। बड़ी राजनीतिक पार्टी ने कुक्कू को उसकी सामाजिक छवि और निचले तबके तक पकड़ को देखते हुए चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया। इधर, कुक्कू चुनाव अभियान में व्यस्त हो गया और उधर, बिल्लू ट्रेनिंग में मस्त हो गया। अब आए दिन अखबारों में अथर्व प्रताप सिंह (कुक्कू) का नाम छपने लगा। यह नाम अखबार में पढ़कर बिल्लू को जाना पहचाना महसूस होता था, पर उसने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अंतत: कुक्कू अपने चुनाव अभियान में सफल हुआ। उसके क्षेत्र की जनता ने उसके व्यवहार और वाकपटुता के चलते सिर आंखों पर बिठ लिया और वो सांसद बन गया। अब लखनऊ की फिजाओं में अथर्व प्रताप सिंह का नाम गूंजने लगा। इस बीच बिल्लू की ट्रेनिंग भी पूरी होने वाली थी और पुलिस इनवेस्टिगेशन होना बकाया था। लखनऊ में हुए झगड़े में बिल्लू के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यही मामला उसकी राह का रोड़ा बन गया। इस मामले के कारण बिल्लू को नो-ड्यूस नहीं मिला। कंपनी ने बिल्लू को बता दिया कि तुम बहुत होशियार हो। हमें तुम्हारा काम भी पसंद है, लेकिन तुम्हारे खिलाफ मामला दर्ज है। इसे किसी भी तरह निपटाओ। अब बिल्लू परेशान हो गया। उसने सारी बात अपने घर पर बताई। उसकी मां ने उसको बताया कि अरे बेटा कुक्कू की मदद क्यों नहीं लेता, वो तो अब बड़ा नेता बन गया है। तू ने सुना नहीं क्या नाम अथर्व प्रताप सिंह। तब बिल्लू को याद आ गया कि जिसके बारे में वो रोज अखबार में पढ़ता था वो उसका बचपन का दोस्त कुक्कू है।
बिल्लू भी जानता था कि उसने कुक्कू के साथ कैसा व्यवहार किया था। इस कारण बिल्लू, कुक्कू से बात करने में हिचकिचा रहा था। किसी तरह हिम्मत बांधकर बिल्लू, कुक्कू के बंगले के बाहर जाकर खड़ा हो गया। देखा तो चारों ओर सुरक्षा का घेरा बिना इजाजत कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। कुक्कू ने बिल्लू को बाहर खड़े देखा तो कुक्कू सुरक्षा घेरा ओर सारे लोगों को छोड़कर सीधे बंगले के बाहर बिल्लू को लेने पहुंच गया। यह देख सभी भौचक रह गए। कुक्कू के पीए से रहा न गया और वो तपाक से बोला, साहब साधारण से आदमी के लिए इतना प्रेम? तो कुक्कू ने डांटते हुए कहा कि ये कोई साधारण आदमी नहीं मेरे बचपन का दोस्त (बिल्लू) दक्ष है। दुर्भाग्य से इसके पैर जमीन से उठ गए थे पर शायद अब वापस जमीन पर आ गए हैं। ऐसा कहते हुए कुक्कू ने बिल्लू की जेब में नो-ड्यूज रख दिया। इसके बाद दोनों गले मिले।
तो मेरे नन्हें दोस्तों जीवन में चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ, अपने पहले के हालात, पुराने दोस्तों और माता-पिता की बताई हुई बातों को कभी न भूलना, क्योंकि ये ही जीवन का आधार हैं। इसी से तुम्हारी समाज में पहचान बनती है, क्योंकि अमीर तो बहुत लोग बन जाते हैं पर अच्छा इंसान बहुत कम लोग बन पाते हैं।
ये कहानी है रायबरेली के दक्ष और अथर्व की है। दोनों पक्के दोस्त थे। सब लोग दक्ष को प्यार से बिल्लू और अथर्व को कुक्कू बुलाते थे। बिल्लू पढऩे में होशियार था, जबकि कुक्कू सामान्य। बिल्लू को इस बात पर घमंड था, क्योंकि उसको क्लास में हमेशा ही शाबाशी मिलती थी। सब लोग उसे कुक्कू से ज्यादा तवज्जो देते थे, लेकिन कुक्कू के बातचीत के ढंग के सभी मुरीद थे, परन्तु टीचर बिल्लू की ज्यादा तारीफ किया करती थीं। धीरे-धीरे दोनों बड़े हुए। बिल्लू हमेशा कुक्कू से एक कदम आगे ही रहा। इस कारण कुक्कू के परिवार वाले हमेशा बिल्लू से कुक्कू की तुलना किया करते थे। कॉलेज तक दोनों ने साथ-साथ ही पढ़ाई की। अब तक कुक्कू ने अपना सामाजिक दायरा काफी बढ़ा लिया था। वहीं बिल्लू पढ़ाई में मस्त रहता था। कुक्कू की मां इस बात से काफी परेशान रहती थी। वो कुक्कू को बार-बार समझाती थी कि समाज में ज्यादातर लोग तुझे जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि सब तुझे पसंद ही करते हैं। अरे पढ़-लिख जाएगा तो सब सलाम ठोकेंगे, तारीफ करेंगे नहीं तो सब लोग पीठ-पीछे तेरी नहीं, हमारी बुराई करेंगे। कुक्कू को मां की यह बातें काफी बुरी लगती थीं, लेकिन वो भी क्या करे उसका मन पढ़ार्ई में ज्यादा न लगता था। परिस्थितियां बदलने के साथ-साथा कुक्कू और बिल्लू की राह भी बदल गई। बिल्लू पढऩे के लिए रायबरेली छोड़कर लखनऊ निकल गया, जबकि कुक्कू रायबरेली में रहा। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे कम होने लगी। लगभग पूरा दिन साथ बिताने वाले दोस्त अब कभी-कभी ही बात करते थे। कुक्कू को बिल्लू की बहुत याद आती थी। वहीं बिल्लू अपने नए दोस्तों में मस्त हो चुका था। एक बार किसी काम से कुक्कू लखनऊ गया तो उसने सोचा क्यों न बिल्लू से भी मिल लिया जाए। वो बिल्लू से मिलने उसके कॉलेज गया, लेकिन बिल्लू ने पहचान तक न दिखाई। बिल्लू अब शहरी हो गया था। बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगा था। बिल्लू अपनी मां की बात (बेटा चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ पर पैर जमीन पर ही रहने देना) को पूरी तरह भूल चुका था। कुक्कू बुरी याद लेकर वापस लौट गया। वापस घर जाते समय, कार में उसके पहचान वाले ने उससे पूछा- क्योंï, मिल आए अपने दोस्त से? तो उसने बुझे मन से कहा, हां मिल आया। कुक्कू का साथी (बड़ी राजनीतिक पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष) सब समझ गया और उसने कहा कि दोस्त चिंता मत करो वक्त सब का आता है। अब दोनों की दोस्ती लगभग खत्म हो चुकी थी। बिल्लू की होशियारी के किस्से कुक्कू को बीच-बीच में मिलते रहे। इसी बीच बिल्लू को एक बड़ी कंपनी से बड़ा सा ऑफर मिला। लखनऊ में छह महीने की ट्रेनिंग के बाद मुंबई जॉइन करना था।
अब समय करवट लेने वाला था और इसी दिन का इंतजार कुक्कू को भी था। बड़ी राजनीतिक पार्टी ने कुक्कू को उसकी सामाजिक छवि और निचले तबके तक पकड़ को देखते हुए चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया। इधर, कुक्कू चुनाव अभियान में व्यस्त हो गया और उधर, बिल्लू ट्रेनिंग में मस्त हो गया। अब आए दिन अखबारों में अथर्व प्रताप सिंह (कुक्कू) का नाम छपने लगा। यह नाम अखबार में पढ़कर बिल्लू को जाना पहचाना महसूस होता था, पर उसने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अंतत: कुक्कू अपने चुनाव अभियान में सफल हुआ। उसके क्षेत्र की जनता ने उसके व्यवहार और वाकपटुता के चलते सिर आंखों पर बिठ लिया और वो सांसद बन गया। अब लखनऊ की फिजाओं में अथर्व प्रताप सिंह का नाम गूंजने लगा। इस बीच बिल्लू की ट्रेनिंग भी पूरी होने वाली थी और पुलिस इनवेस्टिगेशन होना बकाया था। लखनऊ में हुए झगड़े में बिल्लू के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यही मामला उसकी राह का रोड़ा बन गया। इस मामले के कारण बिल्लू को नो-ड्यूस नहीं मिला। कंपनी ने बिल्लू को बता दिया कि तुम बहुत होशियार हो। हमें तुम्हारा काम भी पसंद है, लेकिन तुम्हारे खिलाफ मामला दर्ज है। इसे किसी भी तरह निपटाओ। अब बिल्लू परेशान हो गया। उसने सारी बात अपने घर पर बताई। उसकी मां ने उसको बताया कि अरे बेटा कुक्कू की मदद क्यों नहीं लेता, वो तो अब बड़ा नेता बन गया है। तू ने सुना नहीं क्या नाम अथर्व प्रताप सिंह। तब बिल्लू को याद आ गया कि जिसके बारे में वो रोज अखबार में पढ़ता था वो उसका बचपन का दोस्त कुक्कू है।
बिल्लू भी जानता था कि उसने कुक्कू के साथ कैसा व्यवहार किया था। इस कारण बिल्लू, कुक्कू से बात करने में हिचकिचा रहा था। किसी तरह हिम्मत बांधकर बिल्लू, कुक्कू के बंगले के बाहर जाकर खड़ा हो गया। देखा तो चारों ओर सुरक्षा का घेरा बिना इजाजत कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। कुक्कू ने बिल्लू को बाहर खड़े देखा तो कुक्कू सुरक्षा घेरा ओर सारे लोगों को छोड़कर सीधे बंगले के बाहर बिल्लू को लेने पहुंच गया। यह देख सभी भौचक रह गए। कुक्कू के पीए से रहा न गया और वो तपाक से बोला, साहब साधारण से आदमी के लिए इतना प्रेम? तो कुक्कू ने डांटते हुए कहा कि ये कोई साधारण आदमी नहीं मेरे बचपन का दोस्त (बिल्लू) दक्ष है। दुर्भाग्य से इसके पैर जमीन से उठ गए थे पर शायद अब वापस जमीन पर आ गए हैं। ऐसा कहते हुए कुक्कू ने बिल्लू की जेब में नो-ड्यूज रख दिया। इसके बाद दोनों गले मिले।
तो मेरे नन्हें दोस्तों जीवन में चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ, अपने पहले के हालात, पुराने दोस्तों और माता-पिता की बताई हुई बातों को कभी न भूलना, क्योंकि ये ही जीवन का आधार हैं। इसी से तुम्हारी समाज में पहचान बनती है, क्योंकि अमीर तो बहुत लोग बन जाते हैं पर अच्छा इंसान बहुत कम लोग बन पाते हैं।





आज से लगभग दो साल पहले मैं इंदौर में था। इंदौर पीपुल्स समाचार के समूह संपादक ने एक दिन कहा कि तुम्हारा ट्रांसफर ग्वालियर कर दिया गया है। आपको तीन दिन बाद वहां जॉइन करना है। मैंने भी राहत की सांस ली, क्योंकि एकाकी जीवन से मैं उक्ताने लगा था और कुछ दिन पहले तक घर के आसपास जाना भी चाहता था। तो जहन में मध्यप्रदेश का एक ही शहर आता था, ग्वालियर। हालाकि जब ट्रांसफर हुआ तब तक मैं पुन: इंदौर में ही फिर नए जोश के साथ काम करने का मन बना चुका था। खैर ये अलग बात है, क्योंकि हम जब जो चाहते हैं, हमें वो नहीं मिलता। ग्वालियर ट्रांसफर की बात सुनते ही मन में चंबल के बीहड़ और डाकुओं की कहानियां कौंधने लगीं थीं। लगभग मार्च २०१० में, मैं ग्वालियर आ गया और कुछ ही महीने बाद राजस्थान पत्रिका जॉइन कर लिया। डाकुओं, बदमाशों से मुठभेड़ और गोलियों की आवाज तो यहां के लोगों के लिए आम बात थी। खासकर भिण्ड और मुरैना में रहने वालों के लिए। यहां आकर पता चला कि चंबल नदी को स्थानीय भाषा में चामिल कहते हैं। मेरे साथ काम करने वाले श्री अनिल श्रीवास्तव ने एक कहावत सुनाई एक लोटा चामिल को पानी और सौ मुलक को घी। तब से ही चंबल के पानी की इस तासीर की अनुभूति की तीव्र इच्छा मन में उत्पन्न हो गई। और एक दिन अपने काबिल दोस्त महेन्द्र राजौरे और प्रवीण पांडेय के साथ जा पहुंचा चंबल की सैर करने। प्रदेश सरकार ने चंबल सफारी के लिए यहां कुछ नावों का इंतजाम किया है। यहां आकर मालू हुआ कि देश का एकमात्र सबसे बड़े जलीय जीव अभयारण्य है चंबल का यह गलियारा। श्योपुर से लेकर भिण्ड तक के गलियारे में ढेरों घडिय़ाल, मगरमच्छ और डॉलफिंस हैं। साथ ही चंबल के साथ बीहड़ की सुंदरता और शांतता के कारण यहां जनवरी से लेकर अप्रैल तक विदेशी पक्षी भी आते हैं। इन दिनों चंबल का यह पूरा गलियारा विभिन्न प्राणियों की चहचहाहट और कलरव से गूंज उठता है। बीहड़ को टकराकर आने वाली विदेशी पक्षियों की आवाज मन में जोश भर देती हैं। लाइफ जैकेट पहनकर हम सभी लोग बोट में बैठ गए। चंबल का पुल पार करते ही नाव फर्राटे भरने लगी। अब चामिल की विशालता का अनुभव होने लगा था। चामिल की ठंडी-ठंडी बूंदे रोमांच बढ़ा रहीं थीं। बड़े-बड़े घडिय़ाल और मगरमच्छ बिलकुल साफ और बहुत पास नजर आ रहे थे। छोटे से टापू पर बैठे घडिय़ालों के झुंड हमारी हलचल महसूस करते ही पुन: पानी में चले गए। उस समय हमको तो ऐसा लगा मानो वो हम पर ही हमला करने के लिए आगे बढ़ रहे हों। पानी में एक अजीब से हमचल थी। मेरे दोस्त महेन्द्र ने बोट चालक से कहा भाई यहां से चलो वो सब हमारी तरफ ही आ रहे हैं। जैसे ही वहां से आगे बढ़े तो वो दृश्य देखने को मिला जो बहुत कम लोगों को मिलता है। एक छोटा शिकारी, पक्षी का शिकार कर रहा था। घात लगाकर बैठे घडिय़ाल ने पलक झपकते ही विदेशी पक्षी को अपने मुंह में कस लिया और गर्दन अलग कर दी। नैसर्गिक क्रूरता भी यहां आकर ही देखने को मिली। चामिल का पानी एक अजीब से रोमांच का अहसास करा रहा था। अब हम वापस उस स्थान की ओर जा रहे थे, जहां से हम बोट में सवार हुए थे। जैसे ही यहां पहुंचे तो देखा रंगून से आया पक्षियों का जोड़ा गुनगुनी धूप के कारण चमकते पानी में गोते पे गोते लगा रहा था। आसपास खड़े मिट्टी के पहाड़ डाकुओं की जगह चंबल की सुंदरता बढ़ाते नजर आ रहे थे। नदी के ऊपर से गुजरे पुल पर दौड़ते हजारों वाहन बदलते दौरे की गवाही दे रहे थे। अब दुर्दांत डाकुओं की बातें बेकार महसूस होने लगी थीं। तब ऐसा लगा न जाने क्यों लोग पुरानी धारणाओं से उबर नहीं पाते। पर्यटन और रोमांच की तलाश में न जाने कहां-कहां जाते हैं और चंबल को भूल जाते हैं। किसी ने सही कहा है हीरे हमारे पैर के नीचे ही पड़े होते हैं और हम उसकी तलाश में जाने कहां-कहां भटकते हैं या यूं कहें कि हम खुद उन्हें खुद से दूर कर लेते हैं। मैं अपनी निजी जिंदगी की बात करूं तो कुछ शब्द इस सैर के बाद पुन: याद आ गए- प्रयोगवादी बनो न कि परंपरावादी। चीजों को नए तरीके से देखने और समझने का बीड़ा उठाओ तभी जीवन बदलेगा, नहीं तो उबाऊ हो जाएगा।