सुना है मध्यप्रदेश के सॉफ्ट हार्टेड सीएम ने मंत्रियों और अधिकारियों की बैठक ली। साल की पहली बैठक होने के कारण शायद सभी को लगा होगा कि यह नए साल की बधाइयों से शुरू होकर इसी पर खत्म होगी। वहीं मुख्यमंत्री ने ठीक विपरीत अपने अंदाज को त्यागते हुए कुछ नए फरमान जारी किए। उनके एजेंडे में प्रदेश में होने वाली चंदा वसूली थी। शिवराज ने सख्त तेवर दिखाते हुए सभी से स्पष्ट कहा कि कार्यक्रमों के लिए होने वाली चंदे की उगाही बंद करें। उनकी नजर में चंदा लेने और देने वाला दोनों ही दोषी है। उन्होंने सभी अफसरों को अपने आलीशान कमरों से निकलकर जमीनी हकीकत जानने के लिए ताकीद किया। शिवराज का यह कदम स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ मुख्यमंत्री के कहने भर से यह चंदा उगाही रुक जाएगी। क्या कानून को और प्रभावी बनाने की जरूरत नहीं है? लगभग सभी को मालूम है कि भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों में चंदा उगाही का पैमान क्या है। चूंकि मैं इंदौर में रहा हूं इसलिए यह कह सकता हूं कि चुनाव, पार्टी की रैली या अन्य किसी राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए खुलेआम चंदा उगाही हमेशा से ही की जाती रही है। अधिकतर व्यापारी नेताओं की बुरी नजर से बचने के लिए खुद ही पार्टी फंड में पैसा जमा करा देते हैं। बचे खुचे मुंह छुपाए घूमते हैं कि कहीं चंदे का फरमान न आ जाए। इस दौरान अधिकतर व्यापारी एक अजीब से तनाव से गुजरते हैं। व्यापारी-उद्यमी भी खूब जानते हैं कि इस चंदे के दंश से उनको बचाने वाला कोई नहीं, क्योंकि मुख्यमंत्री के आसपास वो लोग बैठे हैं, जिनके पट्ठों को चंदा उगाही के लिए सर्वाधिक जाना जाता है। ऐसे नेताओं को भी खूब मालूम है कि जब सैंया भऐ कोतवाल तो डर काहे का। जब शासन जेब में तो कानून क्या बिगाड़ेगा और अगर शिकायत हो भी गई तो निपट लेंगे या निपटा देंगे। रही बात आरोप की तो कह देंगे पार्टी फंड में पैसा जमा करवाया गया वो भी उनसे अपनी मर्जी से किया। अब मतभेद हो गए तो साहब आरोप लगा रहे हैं। मतलब मरण होगी तो व्यापारी की ही। अपना तो सीधा से कहना है कि चंदा वसूली पर रोक लगाने की बात ही कहनी थी तो इतने सारे अधिकारियों और मंत्रियों को बुलाने की क्या जरूरत थी। क्या शिवराज नहीं जानते कि कौन हैं वो लोग जो इसकी जड़ में हैं? या पार्टी फंड में आने वाला पैसा कैसे और कहां-कहां से आता है? अखबार में छपी फोटो के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि सीएम सामने बैठे मंत्रियों या
अफसरों के बजाए बगल में बैठे लोगों से ही कह देते तो शायद उनकी मंशा का ठीक-ठीक संदेश जाता है। शिवराज भी खूब जानते हैं कि यदि ऐसे करने से रोक लगा दी जाएगी तो राष्ट्रीय अधिवेशन जैसे बड़े आयोजन पहले जितने भव्य पुन: नहीं हो पाएंगे। उद्योग और व्यापारी वर्ग के हितों की बात करने वाले मुख्यमंत्री इनवेस्टर मीट तो बहुत करा चुके पर असली मुद्दे पर अब पहुंचे हैं यदि पेड़ को मजबूत बनाना है तो जड़ का ध्यान रखना होगा क्योंकि बिना इसके प्रदेश में व्यापार ओर उद्योग जगत खुली सांस नहीं ले सकता। रही बात चंदा वसूली की तो यह तो बस व्यापारियों और उद्यमियों की ढेरों समस्याओं में से एक है। यदि इससे भी छुटकारा मिलता है तो मानो यदाकदा डंसने वाले एक सांप से तो छुटकारा मिल जाएगा। हालांकि 2011 की शुरुआत प्रदेश के सीए ने अच्छे विचार से की है इसलिए मेरी भी उनको बहुत-बहुत शुभकामनाएं, क्योंकि ज्यादा लिखूंगा तो आप ही बोलोगे कि बोलता है।