नारी इन दो अक्षरों में लगभग संपूर्ण संसार समाहित है। भागती दौड़ती जिंदगी में नारी ने अपनी क्षमताओं का विकास करते हुए समाज में विशिष्ट स्थान हासिल किया है। समृद्ध नारी के बिना समृद्ध समाज की परिकल्पना अधूरी है। आज भारत के विका में महिलाओं की महती भूमिका है। इन सब बातों को सच मानें तो महिला उत्पीडऩ या महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आनी चाहिए, लेकिन स्थिति बिल्कुल विपरीत है। इस तरह के मामले देश और समाज में लगातार बढ़ रहे हैं। औरत जन्म से लेकन मरते दम तक जुल्म-ओ-सितम का शिकार हो रही है। कोख में कत्ल से लेकर दहेज उत्पीडऩ जैसे कई मामले देश में हर रोज सामने आते हैं। दरअसल बड़े शहरों में महिलाएं दौड़-धूप कर अपने अस्तित्व को बनाए रखने में तो कामयाब हैं, लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति बिलकुल विपरीत है। ग्वालियर संभाग के मुरैना और भिण्ड जिले में महिलाएं आज भी डर और खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। डाकुओं के लिए देश में भर में कुख्यात चंबल महिला उत्पीडऩ के मामले में भी पीछे नहीं है। यहां औरत की इच्छी या अनिच्छा की समाज ने कभी ज्यादा परवाह की ही नहीं। ताजा मामला मुरैना जिले के एक गांव का है। इस गांव के दो क्षेत्र सिंह का पुरा और तुम्मीपुरा के बीच इज्जत की बात को लेकर ठन गई। दरअसल हुआ यूं कि सिंह का पुरा की श्वेता तुम्मीपुरा के एक आशीष के साथ भाग गई। हालाकि पति से तलाक बगैर गैरमर्द के साथ जाना अपराध सामाजिक दृष्टि से अपराध है, लेकिन जब जुल्म-ओ-सितम हद से गुजर जाए तो मनुष्य कुछ विचित्र ही कर गुजरता है। हालांकि श्वेता के ऐसा करने के कारणों की चर्चा हम आगे करेंगे। श्वेता के घर से भागने के बाद परिजनों ने पुलिस में मामला दर्ज करवाया गया। हमेशा की तरह पुलिस की अकर्मण्य छवि फिर से उजागर हुई। इसके बाद वो हुआ जिसकी कल्पना बड़े शहरों में रहने वाले लोग कर भी नहीं सकते। सिंह का पुरा में रहने वाले श्वेता के ससुरालवाले बदले की आग में झुलस रहे थे। उस पर पुलिस की बेरुखी ने आग में घी का काम किया। तीन दिन बा ही उन्होंने अनगिनत बंदूकों से फायर ठोकते हुए तुम्मीपुरा पर हमला बोल दिया। वे लोग आशीष के घर की महिला (पुष्पा) को उठा लाए और अपने घर में कैद कर लिया। इसके बाद उन्होंने तुम्मीपुरा फरमान भिजवा दिया औरत के बदले औरत। सूचना मिलते ही पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। सिंह का पुरा में पुलिस ने जबरदस्त सर्चिंग की, लेकिन पुष्पा नहीं मिली। पूरे गांव के लोगों को एकत्रित कर पुलिस ने पुष्पा को सामने लाने की बात कही तो परिजन ने पुलिस अधिकारियों के सामने भरी पंचायत में फिर फरमान सुना दिया औरत के बदले औरत। चंबल के बीहड़ में बसे इस गांव के लोग मरने-मारने पर उतार थे। स्थिति को भांगते हुए पूर्व विधायक ने हस्तक्षेप किया और आश्वासन दिया कि श्वेता को जल्द वापस लाया जाएगा। इसके बाद पुष्पा की रिहाई संभव हो सकी। पुलिस के सर्चिंग की पोल खुल गई। दरअसल पुलिस ने उनके घर में सर्चिंग की ही नहीं थी, क्योंकि पुलिस अधिकारी भी जानते थे कि यह मामले जितना सीधे दिख रहा है, चंबालांचल के लिए उतना है नहीं। अगले दिन श्वेता और आशीष ने चंबल के उस पार धौलपुर में सरेंडर किया। आशीष अपने व्यावसायिक स्थान बड़ौदा चला गया तो श्वेता को एसडीएम के समक्ष पेश किया गया। यहां एक चौंकाने वाली बात सामने आई। ससुराल में रोज-रोज की यातना से परेशान श्वेता ने एक बार भी अपने मायके जाने के लिए नहीं कहा। एसडीएम से रोते-गिड़गिडा़ते उसने पति और ससुरालवालों के पास न भेजने की गुहार लगाई। उसकी चीखें ससुराल में दी जाने वाली यातनाओं की गवाही दे रहीं थीं। एसडीएम ने उसे महिला संप्रेक्षण गृह भेजने का निर्णय लिया और नीतू ने भी उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। नीतू को भी पता था कि अगर वो अब अपने मायके या ससुराल गई तो मार दी जाएगी। वहीं नीतू क्यों भागी, जिसके साथ उसने सात फेरे लिए उसके साथ पल भर भी रहने को तैयार नहीं थी। हालाकि यह बात सुनने में तो बहुत सीधी-साधी है और कारणों की तह तक पहुंचना भी उतना ही आसान दिख रहा है। दरअसल चंबलांचल में आज भी महिलाओं की लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी की दशकों पहले थी। मलिाओं के अधिकार मायके और ससुराल में गिरवी पड़े हैं, जिनको याद करना भी अपराध के समान है। बस जीना है ससुरालवालों या पति के मुताबिक चाहे वो यातनाएं दें या कुछ और, लेकिन सिर उठाने का अधिकार नहीं।
मंगलवार, 29 मई 2012
औरत के बदले औरत
नारी इन दो अक्षरों में लगभग संपूर्ण संसार समाहित है। भागती दौड़ती जिंदगी में नारी ने अपनी क्षमताओं का विकास करते हुए समाज में विशिष्ट स्थान हासिल किया है। समृद्ध नारी के बिना समृद्ध समाज की परिकल्पना अधूरी है। आज भारत के विका में महिलाओं की महती भूमिका है। इन सब बातों को सच मानें तो महिला उत्पीडऩ या महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आनी चाहिए, लेकिन स्थिति बिल्कुल विपरीत है। इस तरह के मामले देश और समाज में लगातार बढ़ रहे हैं। औरत जन्म से लेकन मरते दम तक जुल्म-ओ-सितम का शिकार हो रही है। कोख में कत्ल से लेकर दहेज उत्पीडऩ जैसे कई मामले देश में हर रोज सामने आते हैं। दरअसल बड़े शहरों में महिलाएं दौड़-धूप कर अपने अस्तित्व को बनाए रखने में तो कामयाब हैं, लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति बिलकुल विपरीत है। ग्वालियर संभाग के मुरैना और भिण्ड जिले में महिलाएं आज भी डर और खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। डाकुओं के लिए देश में भर में कुख्यात चंबल महिला उत्पीडऩ के मामले में भी पीछे नहीं है। यहां औरत की इच्छी या अनिच्छा की समाज ने कभी ज्यादा परवाह की ही नहीं। ताजा मामला मुरैना जिले के एक गांव का है। इस गांव के दो क्षेत्र सिंह का पुरा और तुम्मीपुरा के बीच इज्जत की बात को लेकर ठन गई। दरअसल हुआ यूं कि सिंह का पुरा की श्वेता तुम्मीपुरा के एक आशीष के साथ भाग गई। हालाकि पति से तलाक बगैर गैरमर्द के साथ जाना अपराध सामाजिक दृष्टि से अपराध है, लेकिन जब जुल्म-ओ-सितम हद से गुजर जाए तो मनुष्य कुछ विचित्र ही कर गुजरता है। हालांकि श्वेता के ऐसा करने के कारणों की चर्चा हम आगे करेंगे। श्वेता के घर से भागने के बाद परिजनों ने पुलिस में मामला दर्ज करवाया गया। हमेशा की तरह पुलिस की अकर्मण्य छवि फिर से उजागर हुई। इसके बाद वो हुआ जिसकी कल्पना बड़े शहरों में रहने वाले लोग कर भी नहीं सकते। सिंह का पुरा में रहने वाले श्वेता के ससुरालवाले बदले की आग में झुलस रहे थे। उस पर पुलिस की बेरुखी ने आग में घी का काम किया। तीन दिन बा ही उन्होंने अनगिनत बंदूकों से फायर ठोकते हुए तुम्मीपुरा पर हमला बोल दिया। वे लोग आशीष के घर की महिला (पुष्पा) को उठा लाए और अपने घर में कैद कर लिया। इसके बाद उन्होंने तुम्मीपुरा फरमान भिजवा दिया औरत के बदले औरत। सूचना मिलते ही पूरा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो गया। सिंह का पुरा में पुलिस ने जबरदस्त सर्चिंग की, लेकिन पुष्पा नहीं मिली। पूरे गांव के लोगों को एकत्रित कर पुलिस ने पुष्पा को सामने लाने की बात कही तो परिजन ने पुलिस अधिकारियों के सामने भरी पंचायत में फिर फरमान सुना दिया औरत के बदले औरत। चंबल के बीहड़ में बसे इस गांव के लोग मरने-मारने पर उतार थे। स्थिति को भांगते हुए पूर्व विधायक ने हस्तक्षेप किया और आश्वासन दिया कि श्वेता को जल्द वापस लाया जाएगा। इसके बाद पुष्पा की रिहाई संभव हो सकी। पुलिस के सर्चिंग की पोल खुल गई। दरअसल पुलिस ने उनके घर में सर्चिंग की ही नहीं थी, क्योंकि पुलिस अधिकारी भी जानते थे कि यह मामले जितना सीधे दिख रहा है, चंबालांचल के लिए उतना है नहीं। अगले दिन श्वेता और आशीष ने चंबल के उस पार धौलपुर में सरेंडर किया। आशीष अपने व्यावसायिक स्थान बड़ौदा चला गया तो श्वेता को एसडीएम के समक्ष पेश किया गया। यहां एक चौंकाने वाली बात सामने आई। ससुराल में रोज-रोज की यातना से परेशान श्वेता ने एक बार भी अपने मायके जाने के लिए नहीं कहा। एसडीएम से रोते-गिड़गिडा़ते उसने पति और ससुरालवालों के पास न भेजने की गुहार लगाई। उसकी चीखें ससुराल में दी जाने वाली यातनाओं की गवाही दे रहीं थीं। एसडीएम ने उसे महिला संप्रेक्षण गृह भेजने का निर्णय लिया और नीतू ने भी उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। नीतू को भी पता था कि अगर वो अब अपने मायके या ससुराल गई तो मार दी जाएगी। वहीं नीतू क्यों भागी, जिसके साथ उसने सात फेरे लिए उसके साथ पल भर भी रहने को तैयार नहीं थी। हालाकि यह बात सुनने में तो बहुत सीधी-साधी है और कारणों की तह तक पहुंचना भी उतना ही आसान दिख रहा है। दरअसल चंबलांचल में आज भी महिलाओं की लगभग वैसी ही स्थिति है जैसी की दशकों पहले थी। मलिाओं के अधिकार मायके और ससुराल में गिरवी पड़े हैं, जिनको याद करना भी अपराध के समान है। बस जीना है ससुरालवालों या पति के मुताबिक चाहे वो यातनाएं दें या कुछ और, लेकिन सिर उठाने का अधिकार नहीं।
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