बुधवार, 30 मई 2012

डाकू नहीं विदेशी पक्षियों की गैंग



         आज से लगभग दो साल पहले मैं इंदौर में था। इंदौर पीपुल्स समाचार के समूह संपादक ने एक दिन कहा कि तुम्हारा ट्रांसफर ग्वालियर कर दिया गया है। आपको तीन दिन बाद वहां जॉइन करना है। मैंने भी राहत की सांस ली, क्योंकि एकाकी जीवन से मैं उक्ताने लगा था और कुछ दिन पहले तक घर के आसपास जाना भी चाहता था। तो जहन में मध्यप्रदेश का एक ही शहर आता था, ग्वालियर। हालाकि जब ट्रांसफर हुआ तब तक मैं पुन: इंदौर में ही फिर नए जोश के साथ काम करने का मन बना चुका था। खैर ये अलग बात है, क्योंकि हम जब जो चाहते हैं, हमें वो नहीं मिलता। ग्वालियर ट्रांसफर की बात सुनते ही मन में चंबल के बीहड़ और डाकुओं की कहानियां कौंधने लगीं थीं। लगभग मार्च २०१० में, मैं ग्वालियर आ गया और कुछ ही महीने बाद राजस्थान पत्रिका जॉइन कर लिया। डाकुओं, बदमाशों से मुठभेड़ और गोलियों की आवाज तो यहां के लोगों के लिए आम बात थी। खासकर भिण्ड और मुरैना में रहने वालों के लिए। यहां आकर पता चला कि चंबल नदी को स्थानीय भाषा में चामिल कहते हैं। मेरे साथ काम करने वाले श्री अनिल श्रीवास्तव ने एक कहावत सुनाई एक लोटा चामिल को पानी और सौ मुलक को घी। तब से ही चंबल के पानी की इस तासीर की अनुभूति की तीव्र इच्छा मन में उत्पन्न हो गई। और एक दिन अपने काबिल दोस्त महेन्द्र राजौरे और प्रवीण पांडेय के साथ जा पहुंचा चंबल की सैर करने। प्रदेश सरकार ने चंबल सफारी के लिए यहां कुछ नावों का इंतजाम किया है। यहां आकर मालू हुआ कि देश का एकमात्र सबसे बड़े जलीय जीव अभयारण्य है चंबल का यह गलियारा। श्योपुर से लेकर भिण्ड तक के गलियारे में ढेरों घडिय़ाल, मगरमच्छ और डॉलफिंस हैं। साथ ही चंबल  के साथ बीहड़ की सुंदरता और शांतता के कारण यहां जनवरी से लेकर अप्रैल तक विदेशी पक्षी भी आते हैं। इन दिनों चंबल का यह पूरा गलियारा विभिन्न प्राणियों की चहचहाहट और कलरव से गूंज उठता है। बीहड़ को टकराकर आने वाली विदेशी पक्षियों की आवाज मन में जोश भर देती हैं। लाइफ जैकेट पहनकर हम सभी लोग बोट में बैठ गए। चंबल का पुल पार करते ही नाव फर्राटे भरने लगी। अब चामिल की विशालता का अनुभव होने लगा था। चामिल की ठंडी-ठंडी बूंदे रोमांच बढ़ा रहीं थीं। बड़े-बड़े घडिय़ाल और मगरमच्छ बिलकुल साफ और बहुत पास नजर आ रहे थे। छोटे से टापू पर बैठे घडिय़ालों के झुंड हमारी हलचल महसूस करते ही पुन: पानी में चले गए। उस समय हमको तो ऐसा लगा मानो वो हम पर ही हमला करने के लिए आगे बढ़ रहे हों। पानी में एक अजीब से हमचल थी। मेरे दोस्त महेन्द्र ने बोट चालक से कहा भाई यहां से चलो वो सब हमारी तरफ ही आ रहे हैं। जैसे ही वहां से आगे बढ़े तो वो दृश्य देखने को मिला जो बहुत कम लोगों को मिलता है। एक छोटा शिकारी, पक्षी का शिकार कर रहा था। घात लगाकर बैठे घडिय़ाल ने पलक झपकते ही विदेशी पक्षी को अपने मुंह में कस लिया और गर्दन अलग कर दी। नैसर्गिक क्रूरता भी यहां आकर ही देखने को मिली। चामिल का पानी एक अजीब से रोमांच का अहसास करा रहा था। अब हम वापस उस स्थान की ओर जा रहे थे, जहां से हम बोट में सवार हुए थे। जैसे ही यहां पहुंचे तो देखा रंगून से आया पक्षियों का जोड़ा गुनगुनी धूप के कारण चमकते पानी में गोते पे गोते लगा रहा था। आसपास खड़े मिट्टी के पहाड़ डाकुओं की जगह चंबल की सुंदरता बढ़ाते नजर आ रहे थे। नदी के ऊपर से गुजरे पुल पर दौड़ते हजारों वाहन बदलते दौरे की गवाही दे रहे थे। अब दुर्दांत डाकुओं की बातें बेकार महसूस होने लगी थीं। तब ऐसा लगा न जाने क्यों लोग पुरानी धारणाओं से उबर नहीं पाते। पर्यटन और रोमांच की तलाश में न जाने कहां-कहां जाते हैं और चंबल को भूल जाते हैं। किसी ने सही कहा है हीरे हमारे पैर के नीचे ही पड़े होते हैं और हम उसकी तलाश में जाने कहां-कहां भटकते हैं या यूं कहें कि हम खुद उन्हें खुद से दूर कर लेते हैं। मैं अपनी निजी जिंदगी की बात करूं तो कुछ शब्द इस सैर के बाद पुन: याद आ गए- प्रयोगवादी बनो न कि परंपरावादी। चीजों को नए तरीके से देखने और समझने का बीड़ा उठाओ तभी जीवन बदलेगा, नहीं तो उबाऊ हो जाएगा।

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