मंगलवार, 19 जून 2012

नहीं करनी शादी

कूप्रथाओं और भारतीय समाज का चोली दामन का साथ रहा है। यह कालिख न जाने कितनी महिलाओं के जीवन को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल चुकी हैं।और तो और यह सोचकर आश्चर्य होता है कि किसी हद तक आज भी हमारे समाज में ये अपनी जड़ें जमाए हुए हैं, हां फर्क इतना जरूर है कि अब नारी ने अपनी आवाज मुखर करना शुरू कर दिया है। घटना राजस्थान की है...
                                           अजमेर (राजस्थान) से लगभग 50 किलोमीटर दूर सूरजपुरा गांव में रेखा रहती थी। पड़ोस में ही उसका दोस्त दिलीप भी रहता था। गांव की परंपरा के अनुसार पड़ोसी मतलब पहला रिश्तेदार था, इसलिए दोनों परिवारों में आत्मीय प्रेम था। रेखा और दिलीप दोनों साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और खूब सारा समय साथ बिताते थे। दोनों एक-दूसरे को अपना बहुत अच्छा दोस्त मानते थे। बचपन में एक दिन दिलीप नदी में नहाने अपने दोस्तों के साथ गया। इस बात का रेखा को भी पता चल गया था। न जाने क्यों दिलीप का दोस्तों के साथ यूं जाना उसे अच्छा नहीं लगा। रेखा ने नदी पर जाकर दिलीप को वापस लाने की ठान ली और वह निकल पड़ी नदी के लिए। वहां पहुंचकर उसकी आंखों के सामने ही दिलीप का पैर अचानक नदी के किनारे चिकनाई के कारण फिसल गया और पत्थरों से टकराता हुआ वह अचानक नदी की मुख्य धारा में पहुंच गया। यह पूरा घटनाक्रम पलक झपकते ही घटा और अगले ही पल रेखा ने भी नदी में छलांग लगा दी। नदी के बहाव को काटते हुए बहादुर लड़की ने दोस्त का दामन थाम लिया और दोस्त को काल के गाल में जाने से बचा लिया। ये देखकर दिलीप के दोस्त भी सन्न रह गए। घर वापस आते ही रेखा ने पूरी कहानी अपने और दिलीप के घर पर बताई। दिलीप को उसके बापू ने बहुत डांटा और मां ने रोते-रोते दो चार झांपड़ भी लगा दिए। लाड़-प्यार से पला-बड़ा जिगर का टुकड़ा जो था। उधर, रेखा के घरवालों का सीना फक्र से चौड़ा हो रहा था। उनकी बेटी ने कुछ काम ही ऐसा किया था। अब पूरे गांव में दोनों के दोस्ती के चरचे हो रहे थे। इस घटना के बाद रेखा दिलीप और भी ज्यादा करीब आ गए। दोस्ती के इस रिश्ते में प्रेम और स्नेह चरम पर था। रेखा को दिलीप के बिगडऩे का डर था। वो उसके कुछ दोस्तों को बिलकुछ पसंद नहीं करती थी। दिन पर दिन साल पर साल बीतते चले गए। आठवीं कक्षा की ही बात है एक दिन रेखा ने दिलीप को दोस्तों के साथ गांजा पीते देख लिया। यह सब उसे नागवार गुजरा और दिलीप को उसने थप्पड़ मार दिया। दिलीप बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। काफी देर बाद जब होश आया तब दिलीप रेखा के साथ घर पहुंचा। रास्ते में उसने वायदा किया कि अब वो कभी नशा नहीं करेगा। कुछ समय बाद आठवीं का रिजल्ट आया, जिसमें दिलीप फेल हो गया था। वो एक बार फिर नशा करने लगा। दोस्त के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माना। बुरी संगत के कारण वो लगातार पढ़ाई में पिछड़ रहा था। रेखा हर बात की जानकारी अपने और उसके घरवालों को देती थी। अब रेखा गांव छोड़कर आगे की पढ़ाई करने अजमेर आ गई। सोफिया कॉलेज में बमुश्किल मिले दाखिले को उसने एक अवसर की तरह समझा और खूब मन लगाकर पढ़ाई की। तीन साल बाद ग्रेजुएशन पूरा कर जब वो घर पहुंची तो परिवार के सब लोग बहुत खुश थे। पूरा एक दिन परिवारवालों के साथ गुजरा। अगले दिन रेखा जब चाय पी रही थी, तब उसके बापू ने उसे बताया कि उसकी शादी तय कर दी गई है। रेखा वहां से शर्माकर चली गई, पिताजी ने इसको मूक सहमति समझा। मां से जब पूछा तो पता चला कि उसकी शादी तो बचपन में ही तय कर दी गई थी, दिलीप के साथ। यह सुनकर रेखा हैरान थी। जिस मां-बाप ने उसे सोचने-समझने लायक बनाया, उन्होंने ही उसके जीवन के सबसे बड़े फैसले की नींव उससे बिना पूछे डाल दी। कई सारे सवाल दिलो-दिमाग में कौंध रहे थे। इस बात को रेखा बिलकुल भी पचा नहीं पा रही थी। घर में खुशी का माहौल था। सब लोग शादी की तैयारी में लगे थे। इस बीच एक दिन दिलीप मिलने आया। रेखा ने उसे समझाया कि उनके बीच सिर्फ अच्छी दोस्ती है। इस पर दिलीप नाराज होकर चला गया। रेखा ने भी हिम्मत जुटा कर घर में कह दिया कि उसे यह रिश्ता मंजूर नहीं, क्योंकि दिलीप उससे कम पढ़ा-लिखा है और नशा भी करता है। रेखा के बापू ने दो दिन तक खाना नहीं खाया। पूरे घर में मुर्दनी सी छा गई। देर सवेर मां के समझाने पर  रेखा के बापू को समझ में आ ही गया कि वो ठीक नहीं कर रहे। उनकी बच्ची को कहीं ज्यादा अच्छा घर मिल सकता है, क्योंकि वो ज्यादा योग्य है। बापू ने दिलीप के पिता को हाथ-जोड़कर रिश्ता कर पाने में असमर्थता जताई। इस बात पर दिलीप के पिता को गुस्सा आ गया और उन्होंने परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि ये शादी तो होकर रहेगी। नहीं तो तेरी बेटी जिंदा नहीं बचेगी। ये सिर्फ हमारा नहीं पूरी बिरादरी और परंपराओं का सवाल है। आज तुम मना कर रहे हो, कल किसी और की हिम्मत होगी, जबान दी तो दी। ऐसे तो हमारे समाज की सूरत ही बदल जाएगी। रेखा के बापू ने खोखली परंपरा को तोडऩे की प्रार्थना की, लेकिन उनकी किसी ने एक न सुनी। गांव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने भी परंपराओं का हवाला देते हुए हर हाल में शादी कराने को कहा। अब रेखा के पिता बहुत बेबस थे। एक तरफ बेटी थी तो दूसरी तरफ समाज। बापू को इस हालत में देखकर रेखा ने खुद ही इन परिस्थितियों ने निपटने की ठान ली। अगले दिन फिर पंचायत होनी थी। बापू के पीछे-पीछे वो भी पहुंच गई। दोनों को देखकर गांव में जबरदस्त तनाव था। पंचायत ने शादी की तारीख तय की। रेखा ने भरी पंचायत में शादी से इनकार कर दिया। लोग उग्र हो गए और रेखा पर हमला बोल दिया, तेजाब उछाला गया। रेखा ने बचपन में सीखी लाठी के दम पर सबका डटकर मुकाबला किया। किसी तरह वो खुद और बापू को बचाकर घर ले आई। चोटें लगीं जरूर, लेकिन मात्र शरीर पर, मन सशक्त हो गया था। रेखा ने गांव में बदलाव की पहली जंग जीत ली थी। अगले दिन पौ फटते ही दरवाजे पर पत्थर फिकने लगे। आग के गोले भूसे की छत पर फेके जाने लगे। मां-बाप बुरी तरह घबरा रहे थे। रेखा ने हिम्मत न हारते हुए पीछे की दीवार तोड़कर सब को घर के बाहर निकाला और सीधे जा पहुंची मजिस्ट्रेट के सामने। मजिस्ट्रेट साहब ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई। साथ ही आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस को आदेश दिया। कुछ ही दिनों बाद आरोपी गिरफ्तार हुए और कानून ने उन्हें उनको सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस तरह रेखा ने समाज में बदलाव को जन्म दिया और नारी होने का फर्ज निभाया।

सोमवार, 4 जून 2012

तुम लड़की हो

मां एक बात कहूं,
बोलो बेटा
मोहल्ले के कुछ लड़के आते-जाते मुझे परेशान करते हैं। मुझे बहुत खराब लगता है। पापा से कहूं क्या?
रहने दो, तुम ध्यान मत दो। पर मां...
पीछे खड़े पापा भी सब सुन लेते हैं।
पापा भी सलाह देते हैं। अपना रास्ता बदल दो। ध्यान मत दो। रोके तो रुको ही मत। सीधे निकल जाओ। फालतू लोगों की बातों पर क्या ध्यान देना।
नहीं, अगली बार उसने कुछ कहा न तो मैं दो चांटे रसीद कर दूंगी।
तुम पागल हो गई हो क्या, उसने बाद मैं कुछ किया तो। तुम समझती क्यों नहीं हो, तुम लड़की हो। पर मां...
यह पढ़कर आपको कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा, पर मध्यमवर्गीय शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियों की लगभग यही कहानी है। वहीं बड़े शहरों में लड़कियां बिंदास बाहर तो निकलती हैं, पर सहना तो उनको भी पड़ता है। छेड़छाड़, फब्तियां आदि को तो नजरअंदाज करना आदत में ही डालना पड़ता है। और खास बात यह ही हमारा समाज आज भी इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए चुप रहना और सहन करना लड़कियों के चारित्रिक गुण बताकर अपने स्वभाव शामिल करने की सलाह देता है। साथ ही कल तुम ससुराल जाओगी तो क्या... वाला डायलॉग भी सुनाय जाता है। कपड़े पहनने से लेकर-कपड़े सुखाने तक, खाना पकाने से लेकर-खाना खाने तक और घर से बाहर निकलने से लेकर-घर आने तक, हर जगह बार- बार एक लड़की को लड़की होने का अहसास कराया जाता है। हालाकि स्त्री के दामन पर दाग अच्छे नहीं लगते, लेकिन दामन को बचाने से बेहतर है मैला करने वालों का सफाया करना। कुछ ऐसा ही किया मेरी दोस्त अस्मिता ने।
                        ग्वालियर के साइंस कॉलेज में उसका पहला दिन था और पहले ही दिन कुछ अजीब से घटा। कॉलेज के जाने-माने लड़के रॉकी की निगाहें अस्मिता पर पड़ गईं। फूल और कांटे के जमाने में रॉकी भी खुद को अजय देवगन समझ रहा था। अस्मिता के इंतजार में कॉलेज के गेट पर ही बैठा रहता था। जैसे ही अस्मिता गेट पर पहुंचती वो सामने आकर खड़ा हो जाता। अचानक उसको सामने देखकर अस्मिता की रूह कांप जाती थी। रॉकी उससे कई सवाल करता था, हर सवाल को वो टाल जाती थी (तुम कहां रहती हो, तुम्हारा पूरा नाम क्या है, वगैरह-वगैरह)। अब यह रोज की बात बन गया था। अस्मिता को कॉलेज का गेट देखते ही डर लगने लगता था, मन मैं सिर्फ एक ही ख्याल आता था, बस यहीं कहीं बैठा होगा लफंगा, गुंडा कहीं का, बदतमीज। पर बड़ों के बताए रास्ते पर चलते हुए अस्मिता हर बात सहन कर रहती थी। मन ही मन उसे बुरा भी लगता था, क्योंकि अब तक उसे सारा कॉलेज जानने लगा था। उसे देखकर सब लोग कहने लगे थे, अरे ये ही है वो जिसके पीछे रॉकी पड़ा है। अरे भाभीजी आ गईं। यह सब सुनकर अस्मिता का मन बहुत उदास हो जाता था। उसने कॉलेज की टीचर्स से भी कहा, तो उन्होंने भी उसे ध्यान न देने के लिए कहा, रास्ता बदने के लिए कहा। अब तक रॉकी की बदतमीजी काफी बढ़ गई थी। कॉलेज के छात्र संघ का अध्यक्ष होने के कारण उससे कोई कुछ नहीं कहता था और जो कहना चाहते थे वो सब अस्मिता को सलाह देते थे, बेटा तुम ध्यान मत दो तुम लड़की हो। समाज उसे उस बात की सजा दे रहा था जो उसने किया ही नहीं। अब तक रॉकी की बदतमीजी और भी बढ़ गई थी। फिल्मी हीरो की तरह रॉकी दूसरी मंजिल पर पढ़ रही मेरी दोस्त को नीचे से जोर-जोर से आवाज लगाकर बुलाता था। टीचर्स तक कहने लगे थे, अस्मिता सुनलो वो तुम्हे बुला रहा है। मेरी दोस्त कहती मुझे उससे बात नहीं करनी सर। तो टीचर्स कहते, बेटा सुन लो नहीं तो वो और चिल्लाएगा, तुम फालतू में ही बदनाम हो रही हो। नीचे आने पर हर बार की तरह मुझे तुम से कुछ कहना है, कि रट्ट लगा देता था। पर कह नहीं पाता था। साथ ही यह भी कहता था तुम क्लास में मत जाया करो मैं नंबर बढ़वा दूंगा, प्रेक्टिकल मत दो मैं सब करवा दूंगा, किसी से कोई परेशानी हो तो बताओ।
                          एक दिन रॉकी का फोन अस्मिता के घर पर आया, रॉकी ने उसको धमकी भरे अंदाज में कहा तुम सफेद कपड़ों में मत आया करो। सब तुमको ही देखते रहते हैं और ये मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। अस्मिता ने फोन पटक दिया। वो रोज-रोज की झंझट से तंग आने लगी थी। धीरे-धीरे दिन पर दिन और महीने पर महीने बीत गए। अब तक अस्मिता का गुस्सा बहुत बढ़ गया था। पर तुम लड़की हो वाली बात उसे कहीं न कहीं रोकती थी। फिर एक दिन वो जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। साल के आखिरी दिन था प्रेक्टिकल चल रहा था। अस्मिता अपनी सहेलियों के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। उसी समय रॉकी का दोस्त आया और कहा कि भाभी आपको रॉकी बुला रहा है। अस्मिता ने कहा अगर मुझ से बात करनी है तो उससे कहो यहां आ जाए, नहीं तो चपरासी की तरह वहीं बैठा रहे। थोड़ी देर से रॉकी आया और क्लास में सब के सामने अस्मिता से कहा बाहर आओ मुझे कुछ बात करनी है। इस पर अस्मिता ने कहा, यहीं कहो जो कुछ कहना है। अब अस्मिता में डर नहीं था। इसके बाद रॉकी ने जैसी ही फिर से बाहर चलने को कहा, अस्मिता ने सब के सामने उसके गाल पर दो चांटे रसीद कर दिए। सब दंग थे, छात्र संघ अध्यक्ष को चांटा। रॉकी गाल पर हाथ रखकर चला गया। उसके जाते ही सब लड़कियों के चेहरे पर जीत की खुशी थी। लड़के भी उसके हौसले से उत्साहित थे। सर ने भी उसको जगह पर बैठाने के बहाने पीठ थपथपा दी। थोड़ी देर बाद वो सर से इजाजत लेकर घर चली गई। उसने सारी कहानी मां को बता दी। मां भी डर गई, लेकिन उसने मां से कहा, मां डरो मत अब मैं डटकर मुकाबला करूंगी। अब बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे लड़की होने का लोग नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कुछ दिन बाद कालेज पहुंची अस्मिता को कालेज का माहौल बदला-बदला लगा रहा था और रॉकी भी सुधर चुका था।
                 इससे एक बात साफ होती है, हम लड़कियां जरूरत से ज्यादा बर्दाश्त करेंगी तो कहीं ज्यादा बर्दाश्त करना होगा। हो सकता है कि नजरअंदाज करने की आदत का लोग गलत फायदा उठाएं। इस कारण मेरा तो यही मानना है कि एक नियत समय के बाद आक्रमण ही सही होता है। बस समय का चुनाव आपको करना है।