मां एक बात कहूं,
बोलो बेटा
मोहल्ले के कुछ लड़के आते-जाते मुझे परेशान करते हैं। मुझे बहुत खराब लगता है। पापा से कहूं क्या?
रहने दो, तुम ध्यान मत दो। पर मां...
पीछे खड़े पापा भी सब सुन लेते हैं।
पापा भी सलाह देते हैं। अपना रास्ता बदल दो। ध्यान मत दो। रोके तो रुको ही मत। सीधे निकल जाओ। फालतू लोगों की बातों पर क्या ध्यान देना।
नहीं, अगली बार उसने कुछ कहा न तो मैं दो चांटे रसीद कर दूंगी।
तुम पागल हो गई हो क्या, उसने बाद मैं कुछ किया तो। तुम समझती क्यों नहीं हो, तुम लड़की हो। पर मां...
यह पढ़कर आपको कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा, पर मध्यमवर्गीय शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियों की लगभग यही कहानी है। वहीं बड़े शहरों में लड़कियां बिंदास बाहर तो निकलती हैं, पर सहना तो उनको भी पड़ता है। छेड़छाड़, फब्तियां आदि को तो नजरअंदाज करना आदत में ही डालना पड़ता है। और खास बात यह ही हमारा समाज आज भी इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए चुप रहना और सहन करना लड़कियों के चारित्रिक गुण बताकर अपने स्वभाव शामिल करने की सलाह देता है। साथ ही कल तुम ससुराल जाओगी तो क्या... वाला डायलॉग भी सुनाय जाता है। कपड़े पहनने से लेकर-कपड़े सुखाने तक, खाना पकाने से लेकर-खाना खाने तक और घर से बाहर निकलने से लेकर-घर आने तक, हर जगह बार- बार एक लड़की को लड़की होने का अहसास कराया जाता है। हालाकि स्त्री के दामन पर दाग अच्छे नहीं लगते, लेकिन दामन को बचाने से बेहतर है मैला करने वालों का सफाया करना। कुछ ऐसा ही किया मेरी दोस्त अस्मिता ने।
ग्वालियर के साइंस कॉलेज में उसका पहला दिन था और पहले ही दिन कुछ अजीब से घटा। कॉलेज के जाने-माने लड़के रॉकी की निगाहें अस्मिता पर पड़ गईं। फूल और कांटे के जमाने में रॉकी भी खुद को अजय देवगन समझ रहा था। अस्मिता के इंतजार में कॉलेज के गेट पर ही बैठा रहता था। जैसे ही अस्मिता गेट पर पहुंचती वो सामने आकर खड़ा हो जाता। अचानक उसको सामने देखकर अस्मिता की रूह कांप जाती थी। रॉकी उससे कई सवाल करता था, हर सवाल को वो टाल जाती थी (तुम कहां रहती हो, तुम्हारा पूरा नाम क्या है, वगैरह-वगैरह)। अब यह रोज की बात बन गया था। अस्मिता को कॉलेज का गेट देखते ही डर लगने लगता था, मन मैं सिर्फ एक ही ख्याल आता था, बस यहीं कहीं बैठा होगा लफंगा, गुंडा कहीं का, बदतमीज। पर बड़ों के बताए रास्ते पर चलते हुए अस्मिता हर बात सहन कर रहती थी। मन ही मन उसे बुरा भी लगता था, क्योंकि अब तक उसे सारा कॉलेज जानने लगा था। उसे देखकर सब लोग कहने लगे थे, अरे ये ही है वो जिसके पीछे रॉकी पड़ा है। अरे भाभीजी आ गईं। यह सब सुनकर अस्मिता का मन बहुत उदास हो जाता था। उसने कॉलेज की टीचर्स से भी कहा, तो उन्होंने भी उसे ध्यान न देने के लिए कहा, रास्ता बदने के लिए कहा। अब तक रॉकी की बदतमीजी काफी बढ़ गई थी। कॉलेज के छात्र संघ का अध्यक्ष होने के कारण उससे कोई कुछ नहीं कहता था और जो कहना चाहते थे वो सब अस्मिता को सलाह देते थे, बेटा तुम ध्यान मत दो तुम लड़की हो। समाज उसे उस बात की सजा दे रहा था जो उसने किया ही नहीं। अब तक रॉकी की बदतमीजी और भी बढ़ गई थी। फिल्मी हीरो की तरह रॉकी दूसरी मंजिल पर पढ़ रही मेरी दोस्त को नीचे से जोर-जोर से आवाज लगाकर बुलाता था। टीचर्स तक कहने लगे थे, अस्मिता सुनलो वो तुम्हे बुला रहा है। मेरी दोस्त कहती मुझे उससे बात नहीं करनी सर। तो टीचर्स कहते, बेटा सुन लो नहीं तो वो और चिल्लाएगा, तुम फालतू में ही बदनाम हो रही हो। नीचे आने पर हर बार की तरह मुझे तुम से कुछ कहना है, कि रट्ट लगा देता था। पर कह नहीं पाता था। साथ ही यह भी कहता था तुम क्लास में मत जाया करो मैं नंबर बढ़वा दूंगा, प्रेक्टिकल मत दो मैं सब करवा दूंगा, किसी से कोई परेशानी हो तो बताओ।
एक दिन रॉकी का फोन अस्मिता के घर पर आया, रॉकी ने उसको धमकी भरे अंदाज में कहा तुम सफेद कपड़ों में मत आया करो। सब तुमको ही देखते रहते हैं और ये मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। अस्मिता ने फोन पटक दिया। वो रोज-रोज की झंझट से तंग आने लगी थी। धीरे-धीरे दिन पर दिन और महीने पर महीने बीत गए। अब तक अस्मिता का गुस्सा बहुत बढ़ गया था। पर तुम लड़की हो वाली बात उसे कहीं न कहीं रोकती थी। फिर एक दिन वो जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। साल के आखिरी दिन था प्रेक्टिकल चल रहा था। अस्मिता अपनी सहेलियों के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। उसी समय रॉकी का दोस्त आया और कहा कि भाभी आपको रॉकी बुला रहा है। अस्मिता ने कहा अगर मुझ से बात करनी है तो उससे कहो यहां आ जाए, नहीं तो चपरासी की तरह वहीं बैठा रहे। थोड़ी देर से रॉकी आया और क्लास में सब के सामने अस्मिता से कहा बाहर आओ मुझे कुछ बात करनी है। इस पर अस्मिता ने कहा, यहीं कहो जो कुछ कहना है। अब अस्मिता में डर नहीं था। इसके बाद रॉकी ने जैसी ही फिर से बाहर चलने को कहा, अस्मिता ने सब के सामने उसके गाल पर दो चांटे रसीद कर दिए। सब दंग थे, छात्र संघ अध्यक्ष को चांटा। रॉकी गाल पर हाथ रखकर चला गया। उसके जाते ही सब लड़कियों के चेहरे पर जीत की खुशी थी। लड़के भी उसके हौसले से उत्साहित थे। सर ने भी उसको जगह पर बैठाने के बहाने पीठ थपथपा दी। थोड़ी देर बाद वो सर से इजाजत लेकर घर चली गई। उसने सारी कहानी मां को बता दी। मां भी डर गई, लेकिन उसने मां से कहा, मां डरो मत अब मैं डटकर मुकाबला करूंगी। अब बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे लड़की होने का लोग नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कुछ दिन बाद कालेज पहुंची अस्मिता को कालेज का माहौल बदला-बदला लगा रहा था और रॉकी भी सुधर चुका था।
इससे एक बात साफ होती है, हम लड़कियां जरूरत से ज्यादा बर्दाश्त करेंगी तो कहीं ज्यादा बर्दाश्त करना होगा। हो सकता है कि नजरअंदाज करने की आदत का लोग गलत फायदा उठाएं। इस कारण मेरा तो यही मानना है कि एक नियत समय के बाद आक्रमण ही सही होता है। बस समय का चुनाव आपको करना है।
बोलो बेटा
मोहल्ले के कुछ लड़के आते-जाते मुझे परेशान करते हैं। मुझे बहुत खराब लगता है। पापा से कहूं क्या?
रहने दो, तुम ध्यान मत दो। पर मां...
पीछे खड़े पापा भी सब सुन लेते हैं।
पापा भी सलाह देते हैं। अपना रास्ता बदल दो। ध्यान मत दो। रोके तो रुको ही मत। सीधे निकल जाओ। फालतू लोगों की बातों पर क्या ध्यान देना।
नहीं, अगली बार उसने कुछ कहा न तो मैं दो चांटे रसीद कर दूंगी।
तुम पागल हो गई हो क्या, उसने बाद मैं कुछ किया तो। तुम समझती क्यों नहीं हो, तुम लड़की हो। पर मां...
यह पढ़कर आपको कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा, पर मध्यमवर्गीय शहरों के मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियों की लगभग यही कहानी है। वहीं बड़े शहरों में लड़कियां बिंदास बाहर तो निकलती हैं, पर सहना तो उनको भी पड़ता है। छेड़छाड़, फब्तियां आदि को तो नजरअंदाज करना आदत में ही डालना पड़ता है। और खास बात यह ही हमारा समाज आज भी इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए चुप रहना और सहन करना लड़कियों के चारित्रिक गुण बताकर अपने स्वभाव शामिल करने की सलाह देता है। साथ ही कल तुम ससुराल जाओगी तो क्या... वाला डायलॉग भी सुनाय जाता है। कपड़े पहनने से लेकर-कपड़े सुखाने तक, खाना पकाने से लेकर-खाना खाने तक और घर से बाहर निकलने से लेकर-घर आने तक, हर जगह बार- बार एक लड़की को लड़की होने का अहसास कराया जाता है। हालाकि स्त्री के दामन पर दाग अच्छे नहीं लगते, लेकिन दामन को बचाने से बेहतर है मैला करने वालों का सफाया करना। कुछ ऐसा ही किया मेरी दोस्त अस्मिता ने।
ग्वालियर के साइंस कॉलेज में उसका पहला दिन था और पहले ही दिन कुछ अजीब से घटा। कॉलेज के जाने-माने लड़के रॉकी की निगाहें अस्मिता पर पड़ गईं। फूल और कांटे के जमाने में रॉकी भी खुद को अजय देवगन समझ रहा था। अस्मिता के इंतजार में कॉलेज के गेट पर ही बैठा रहता था। जैसे ही अस्मिता गेट पर पहुंचती वो सामने आकर खड़ा हो जाता। अचानक उसको सामने देखकर अस्मिता की रूह कांप जाती थी। रॉकी उससे कई सवाल करता था, हर सवाल को वो टाल जाती थी (तुम कहां रहती हो, तुम्हारा पूरा नाम क्या है, वगैरह-वगैरह)। अब यह रोज की बात बन गया था। अस्मिता को कॉलेज का गेट देखते ही डर लगने लगता था, मन मैं सिर्फ एक ही ख्याल आता था, बस यहीं कहीं बैठा होगा लफंगा, गुंडा कहीं का, बदतमीज। पर बड़ों के बताए रास्ते पर चलते हुए अस्मिता हर बात सहन कर रहती थी। मन ही मन उसे बुरा भी लगता था, क्योंकि अब तक उसे सारा कॉलेज जानने लगा था। उसे देखकर सब लोग कहने लगे थे, अरे ये ही है वो जिसके पीछे रॉकी पड़ा है। अरे भाभीजी आ गईं। यह सब सुनकर अस्मिता का मन बहुत उदास हो जाता था। उसने कॉलेज की टीचर्स से भी कहा, तो उन्होंने भी उसे ध्यान न देने के लिए कहा, रास्ता बदने के लिए कहा। अब तक रॉकी की बदतमीजी काफी बढ़ गई थी। कॉलेज के छात्र संघ का अध्यक्ष होने के कारण उससे कोई कुछ नहीं कहता था और जो कहना चाहते थे वो सब अस्मिता को सलाह देते थे, बेटा तुम ध्यान मत दो तुम लड़की हो। समाज उसे उस बात की सजा दे रहा था जो उसने किया ही नहीं। अब तक रॉकी की बदतमीजी और भी बढ़ गई थी। फिल्मी हीरो की तरह रॉकी दूसरी मंजिल पर पढ़ रही मेरी दोस्त को नीचे से जोर-जोर से आवाज लगाकर बुलाता था। टीचर्स तक कहने लगे थे, अस्मिता सुनलो वो तुम्हे बुला रहा है। मेरी दोस्त कहती मुझे उससे बात नहीं करनी सर। तो टीचर्स कहते, बेटा सुन लो नहीं तो वो और चिल्लाएगा, तुम फालतू में ही बदनाम हो रही हो। नीचे आने पर हर बार की तरह मुझे तुम से कुछ कहना है, कि रट्ट लगा देता था। पर कह नहीं पाता था। साथ ही यह भी कहता था तुम क्लास में मत जाया करो मैं नंबर बढ़वा दूंगा, प्रेक्टिकल मत दो मैं सब करवा दूंगा, किसी से कोई परेशानी हो तो बताओ।
एक दिन रॉकी का फोन अस्मिता के घर पर आया, रॉकी ने उसको धमकी भरे अंदाज में कहा तुम सफेद कपड़ों में मत आया करो। सब तुमको ही देखते रहते हैं और ये मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। अस्मिता ने फोन पटक दिया। वो रोज-रोज की झंझट से तंग आने लगी थी। धीरे-धीरे दिन पर दिन और महीने पर महीने बीत गए। अब तक अस्मिता का गुस्सा बहुत बढ़ गया था। पर तुम लड़की हो वाली बात उसे कहीं न कहीं रोकती थी। फिर एक दिन वो जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। साल के आखिरी दिन था प्रेक्टिकल चल रहा था। अस्मिता अपनी सहेलियों के साथ अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। उसी समय रॉकी का दोस्त आया और कहा कि भाभी आपको रॉकी बुला रहा है। अस्मिता ने कहा अगर मुझ से बात करनी है तो उससे कहो यहां आ जाए, नहीं तो चपरासी की तरह वहीं बैठा रहे। थोड़ी देर से रॉकी आया और क्लास में सब के सामने अस्मिता से कहा बाहर आओ मुझे कुछ बात करनी है। इस पर अस्मिता ने कहा, यहीं कहो जो कुछ कहना है। अब अस्मिता में डर नहीं था। इसके बाद रॉकी ने जैसी ही फिर से बाहर चलने को कहा, अस्मिता ने सब के सामने उसके गाल पर दो चांटे रसीद कर दिए। सब दंग थे, छात्र संघ अध्यक्ष को चांटा। रॉकी गाल पर हाथ रखकर चला गया। उसके जाते ही सब लड़कियों के चेहरे पर जीत की खुशी थी। लड़के भी उसके हौसले से उत्साहित थे। सर ने भी उसको जगह पर बैठाने के बहाने पीठ थपथपा दी। थोड़ी देर बाद वो सर से इजाजत लेकर घर चली गई। उसने सारी कहानी मां को बता दी। मां भी डर गई, लेकिन उसने मां से कहा, मां डरो मत अब मैं डटकर मुकाबला करूंगी। अब बर्दाश्त नहीं करूंगी। मेरे लड़की होने का लोग नाजायज फायदा उठा रहे हैं। कुछ दिन बाद कालेज पहुंची अस्मिता को कालेज का माहौल बदला-बदला लगा रहा था और रॉकी भी सुधर चुका था।
इससे एक बात साफ होती है, हम लड़कियां जरूरत से ज्यादा बर्दाश्त करेंगी तो कहीं ज्यादा बर्दाश्त करना होगा। हो सकता है कि नजरअंदाज करने की आदत का लोग गलत फायदा उठाएं। इस कारण मेरा तो यही मानना है कि एक नियत समय के बाद आक्रमण ही सही होता है। बस समय का चुनाव आपको करना है।
3 टिप्पणियां:
जैसे जैसे हम तथाकथित मॉडर्न और आधुनिक होते जा रहे हैं वैसे वैसे जीना मुश्किल होता जा रहा है... स्त्री समाज के लिए तो आज की परिस्थतियाँ बड़ी विकत हैं.... समाज के काले सच को बड़े बेबाकी अंदाज़ से अपने सामने ही नहीं रखा वरन यह भी बताया की जीना कैसे हैं..
यह सच हैं आप अगर बुरे का प्रतिकार नहीं करेंगे तो उसके हौसले बढ़ेंगे और वो तुम पर हावी होती जाएगी....
mera bhai ab KAHANIKAAR ban raha hai, khushi hui padh kr. keep it up. best of luck
dhanyavaad lokendra bhai aapne teppani karke maere hosla afjai ki hae.
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