कूप्रथाओं और भारतीय समाज का चोली दामन का साथ रहा है। यह कालिख न जाने कितनी महिलाओं के जीवन को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल चुकी हैं।और तो और यह सोचकर आश्चर्य होता है कि किसी हद तक आज भी हमारे समाज में ये अपनी जड़ें जमाए हुए हैं, हां फर्क इतना जरूर है कि अब नारी ने अपनी आवाज मुखर करना शुरू कर दिया है। घटना राजस्थान की है...
अजमेर (राजस्थान) से लगभग 50 किलोमीटर दूर सूरजपुरा गांव में रेखा रहती थी। पड़ोस में ही उसका दोस्त दिलीप भी रहता था। गांव की परंपरा के अनुसार पड़ोसी मतलब पहला रिश्तेदार था, इसलिए दोनों परिवारों में आत्मीय प्रेम था। रेखा और दिलीप दोनों साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और खूब सारा समय साथ बिताते थे। दोनों एक-दूसरे को अपना बहुत अच्छा दोस्त मानते थे। बचपन में एक दिन दिलीप नदी में नहाने अपने दोस्तों के साथ गया। इस बात का रेखा को भी पता चल गया था। न जाने क्यों दिलीप का दोस्तों के साथ यूं जाना उसे अच्छा नहीं लगा। रेखा ने नदी पर जाकर दिलीप को वापस लाने की ठान ली और वह निकल पड़ी नदी के लिए। वहां पहुंचकर उसकी आंखों के सामने ही दिलीप का पैर अचानक नदी के किनारे चिकनाई के कारण फिसल गया और पत्थरों से टकराता हुआ वह अचानक नदी की मुख्य धारा में पहुंच गया। यह पूरा घटनाक्रम पलक झपकते ही घटा और अगले ही पल रेखा ने भी नदी में छलांग लगा दी। नदी के बहाव को काटते हुए बहादुर लड़की ने दोस्त का दामन थाम लिया और दोस्त को काल के गाल में जाने से बचा लिया। ये देखकर दिलीप के दोस्त भी सन्न रह गए। घर वापस आते ही रेखा ने पूरी कहानी अपने और दिलीप के घर पर बताई। दिलीप को उसके बापू ने बहुत डांटा और मां ने रोते-रोते दो चार झांपड़ भी लगा दिए। लाड़-प्यार से पला-बड़ा जिगर का टुकड़ा जो था। उधर, रेखा के घरवालों का सीना फक्र से चौड़ा हो रहा था। उनकी बेटी ने कुछ काम ही ऐसा किया था। अब पूरे गांव में दोनों के दोस्ती के चरचे हो रहे थे। इस घटना के बाद रेखा दिलीप और भी ज्यादा करीब आ गए। दोस्ती के इस रिश्ते में प्रेम और स्नेह चरम पर था। रेखा को दिलीप के बिगडऩे का डर था। वो उसके कुछ दोस्तों को बिलकुछ पसंद नहीं करती थी। दिन पर दिन साल पर साल बीतते चले गए। आठवीं कक्षा की ही बात है एक दिन रेखा ने दिलीप को दोस्तों के साथ गांजा पीते देख लिया। यह सब उसे नागवार गुजरा और दिलीप को उसने थप्पड़ मार दिया। दिलीप बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। काफी देर बाद जब होश आया तब दिलीप रेखा के साथ घर पहुंचा। रास्ते में उसने वायदा किया कि अब वो कभी नशा नहीं करेगा। कुछ समय बाद आठवीं का रिजल्ट आया, जिसमें दिलीप फेल हो गया था। वो एक बार फिर नशा करने लगा। दोस्त के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माना। बुरी संगत के कारण वो लगातार पढ़ाई में पिछड़ रहा था। रेखा हर बात की जानकारी अपने और उसके घरवालों को देती थी। अब रेखा गांव छोड़कर आगे की पढ़ाई करने अजमेर आ गई। सोफिया कॉलेज में बमुश्किल मिले दाखिले को उसने एक अवसर की तरह समझा और खूब मन लगाकर पढ़ाई की। तीन साल बाद ग्रेजुएशन पूरा कर जब वो घर पहुंची तो परिवार के सब लोग बहुत खुश थे। पूरा एक दिन परिवारवालों के साथ गुजरा। अगले दिन रेखा जब चाय पी रही थी, तब उसके बापू ने उसे बताया कि उसकी शादी तय कर दी गई है। रेखा वहां से शर्माकर चली गई, पिताजी ने इसको मूक सहमति समझा। मां से जब पूछा तो पता चला कि उसकी शादी तो बचपन में ही तय कर दी गई थी, दिलीप के साथ। यह सुनकर रेखा हैरान थी। जिस मां-बाप ने उसे सोचने-समझने लायक बनाया, उन्होंने ही उसके जीवन के सबसे बड़े फैसले की नींव उससे बिना पूछे डाल दी। कई सारे सवाल दिलो-दिमाग में कौंध रहे थे। इस बात को रेखा बिलकुल भी पचा नहीं पा रही थी। घर में खुशी का माहौल था। सब लोग शादी की तैयारी में लगे थे। इस बीच एक दिन दिलीप मिलने आया। रेखा ने उसे समझाया कि उनके बीच सिर्फ अच्छी दोस्ती है। इस पर दिलीप नाराज होकर चला गया। रेखा ने भी हिम्मत जुटा कर घर में कह दिया कि उसे यह रिश्ता मंजूर नहीं, क्योंकि दिलीप उससे कम पढ़ा-लिखा है और नशा भी करता है। रेखा के बापू ने दो दिन तक खाना नहीं खाया। पूरे घर में मुर्दनी सी छा गई। देर सवेर मां के समझाने पर रेखा के बापू को समझ में आ ही गया कि वो ठीक नहीं कर रहे। उनकी बच्ची को कहीं ज्यादा अच्छा घर मिल सकता है, क्योंकि वो ज्यादा योग्य है। बापू ने दिलीप के पिता को हाथ-जोड़कर रिश्ता कर पाने में असमर्थता जताई। इस बात पर दिलीप के पिता को गुस्सा आ गया और उन्होंने परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि ये शादी तो होकर रहेगी। नहीं तो तेरी बेटी जिंदा नहीं बचेगी। ये सिर्फ हमारा नहीं पूरी बिरादरी और परंपराओं का सवाल है। आज तुम मना कर रहे हो, कल किसी और की हिम्मत होगी, जबान दी तो दी। ऐसे तो हमारे समाज की सूरत ही बदल जाएगी। रेखा के बापू ने खोखली परंपरा को तोडऩे की प्रार्थना की, लेकिन उनकी किसी ने एक न सुनी। गांव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने भी परंपराओं का हवाला देते हुए हर हाल में शादी कराने को कहा। अब रेखा के पिता बहुत बेबस थे। एक तरफ बेटी थी तो दूसरी तरफ समाज। बापू को इस हालत में देखकर रेखा ने खुद ही इन परिस्थितियों ने निपटने की ठान ली। अगले दिन फिर पंचायत होनी थी। बापू के पीछे-पीछे वो भी पहुंच गई। दोनों को देखकर गांव में जबरदस्त तनाव था। पंचायत ने शादी की तारीख तय की। रेखा ने भरी पंचायत में शादी से इनकार कर दिया। लोग उग्र हो गए और रेखा पर हमला बोल दिया, तेजाब उछाला गया। रेखा ने बचपन में सीखी लाठी के दम पर सबका डटकर मुकाबला किया। किसी तरह वो खुद और बापू को बचाकर घर ले आई। चोटें लगीं जरूर, लेकिन मात्र शरीर पर, मन सशक्त हो गया था। रेखा ने गांव में बदलाव की पहली जंग जीत ली थी। अगले दिन पौ फटते ही दरवाजे पर पत्थर फिकने लगे। आग के गोले भूसे की छत पर फेके जाने लगे। मां-बाप बुरी तरह घबरा रहे थे। रेखा ने हिम्मत न हारते हुए पीछे की दीवार तोड़कर सब को घर के बाहर निकाला और सीधे जा पहुंची मजिस्ट्रेट के सामने। मजिस्ट्रेट साहब ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई। साथ ही आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस को आदेश दिया। कुछ ही दिनों बाद आरोपी गिरफ्तार हुए और कानून ने उन्हें उनको सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस तरह रेखा ने समाज में बदलाव को जन्म दिया और नारी होने का फर्ज निभाया।
अजमेर (राजस्थान) से लगभग 50 किलोमीटर दूर सूरजपुरा गांव में रेखा रहती थी। पड़ोस में ही उसका दोस्त दिलीप भी रहता था। गांव की परंपरा के अनुसार पड़ोसी मतलब पहला रिश्तेदार था, इसलिए दोनों परिवारों में आत्मीय प्रेम था। रेखा और दिलीप दोनों साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते और खूब सारा समय साथ बिताते थे। दोनों एक-दूसरे को अपना बहुत अच्छा दोस्त मानते थे। बचपन में एक दिन दिलीप नदी में नहाने अपने दोस्तों के साथ गया। इस बात का रेखा को भी पता चल गया था। न जाने क्यों दिलीप का दोस्तों के साथ यूं जाना उसे अच्छा नहीं लगा। रेखा ने नदी पर जाकर दिलीप को वापस लाने की ठान ली और वह निकल पड़ी नदी के लिए। वहां पहुंचकर उसकी आंखों के सामने ही दिलीप का पैर अचानक नदी के किनारे चिकनाई के कारण फिसल गया और पत्थरों से टकराता हुआ वह अचानक नदी की मुख्य धारा में पहुंच गया। यह पूरा घटनाक्रम पलक झपकते ही घटा और अगले ही पल रेखा ने भी नदी में छलांग लगा दी। नदी के बहाव को काटते हुए बहादुर लड़की ने दोस्त का दामन थाम लिया और दोस्त को काल के गाल में जाने से बचा लिया। ये देखकर दिलीप के दोस्त भी सन्न रह गए। घर वापस आते ही रेखा ने पूरी कहानी अपने और दिलीप के घर पर बताई। दिलीप को उसके बापू ने बहुत डांटा और मां ने रोते-रोते दो चार झांपड़ भी लगा दिए। लाड़-प्यार से पला-बड़ा जिगर का टुकड़ा जो था। उधर, रेखा के घरवालों का सीना फक्र से चौड़ा हो रहा था। उनकी बेटी ने कुछ काम ही ऐसा किया था। अब पूरे गांव में दोनों के दोस्ती के चरचे हो रहे थे। इस घटना के बाद रेखा दिलीप और भी ज्यादा करीब आ गए। दोस्ती के इस रिश्ते में प्रेम और स्नेह चरम पर था। रेखा को दिलीप के बिगडऩे का डर था। वो उसके कुछ दोस्तों को बिलकुछ पसंद नहीं करती थी। दिन पर दिन साल पर साल बीतते चले गए। आठवीं कक्षा की ही बात है एक दिन रेखा ने दिलीप को दोस्तों के साथ गांजा पीते देख लिया। यह सब उसे नागवार गुजरा और दिलीप को उसने थप्पड़ मार दिया। दिलीप बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ा। काफी देर बाद जब होश आया तब दिलीप रेखा के साथ घर पहुंचा। रास्ते में उसने वायदा किया कि अब वो कभी नशा नहीं करेगा। कुछ समय बाद आठवीं का रिजल्ट आया, जिसमें दिलीप फेल हो गया था। वो एक बार फिर नशा करने लगा। दोस्त के लाख मना करने के बावजूद वो नहीं माना। बुरी संगत के कारण वो लगातार पढ़ाई में पिछड़ रहा था। रेखा हर बात की जानकारी अपने और उसके घरवालों को देती थी। अब रेखा गांव छोड़कर आगे की पढ़ाई करने अजमेर आ गई। सोफिया कॉलेज में बमुश्किल मिले दाखिले को उसने एक अवसर की तरह समझा और खूब मन लगाकर पढ़ाई की। तीन साल बाद ग्रेजुएशन पूरा कर जब वो घर पहुंची तो परिवार के सब लोग बहुत खुश थे। पूरा एक दिन परिवारवालों के साथ गुजरा। अगले दिन रेखा जब चाय पी रही थी, तब उसके बापू ने उसे बताया कि उसकी शादी तय कर दी गई है। रेखा वहां से शर्माकर चली गई, पिताजी ने इसको मूक सहमति समझा। मां से जब पूछा तो पता चला कि उसकी शादी तो बचपन में ही तय कर दी गई थी, दिलीप के साथ। यह सुनकर रेखा हैरान थी। जिस मां-बाप ने उसे सोचने-समझने लायक बनाया, उन्होंने ही उसके जीवन के सबसे बड़े फैसले की नींव उससे बिना पूछे डाल दी। कई सारे सवाल दिलो-दिमाग में कौंध रहे थे। इस बात को रेखा बिलकुल भी पचा नहीं पा रही थी। घर में खुशी का माहौल था। सब लोग शादी की तैयारी में लगे थे। इस बीच एक दिन दिलीप मिलने आया। रेखा ने उसे समझाया कि उनके बीच सिर्फ अच्छी दोस्ती है। इस पर दिलीप नाराज होकर चला गया। रेखा ने भी हिम्मत जुटा कर घर में कह दिया कि उसे यह रिश्ता मंजूर नहीं, क्योंकि दिलीप उससे कम पढ़ा-लिखा है और नशा भी करता है। रेखा के बापू ने दो दिन तक खाना नहीं खाया। पूरे घर में मुर्दनी सी छा गई। देर सवेर मां के समझाने पर रेखा के बापू को समझ में आ ही गया कि वो ठीक नहीं कर रहे। उनकी बच्ची को कहीं ज्यादा अच्छा घर मिल सकता है, क्योंकि वो ज्यादा योग्य है। बापू ने दिलीप के पिता को हाथ-जोड़कर रिश्ता कर पाने में असमर्थता जताई। इस बात पर दिलीप के पिता को गुस्सा आ गया और उन्होंने परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि ये शादी तो होकर रहेगी। नहीं तो तेरी बेटी जिंदा नहीं बचेगी। ये सिर्फ हमारा नहीं पूरी बिरादरी और परंपराओं का सवाल है। आज तुम मना कर रहे हो, कल किसी और की हिम्मत होगी, जबान दी तो दी। ऐसे तो हमारे समाज की सूरत ही बदल जाएगी। रेखा के बापू ने खोखली परंपरा को तोडऩे की प्रार्थना की, लेकिन उनकी किसी ने एक न सुनी। गांव में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने भी परंपराओं का हवाला देते हुए हर हाल में शादी कराने को कहा। अब रेखा के पिता बहुत बेबस थे। एक तरफ बेटी थी तो दूसरी तरफ समाज। बापू को इस हालत में देखकर रेखा ने खुद ही इन परिस्थितियों ने निपटने की ठान ली। अगले दिन फिर पंचायत होनी थी। बापू के पीछे-पीछे वो भी पहुंच गई। दोनों को देखकर गांव में जबरदस्त तनाव था। पंचायत ने शादी की तारीख तय की। रेखा ने भरी पंचायत में शादी से इनकार कर दिया। लोग उग्र हो गए और रेखा पर हमला बोल दिया, तेजाब उछाला गया। रेखा ने बचपन में सीखी लाठी के दम पर सबका डटकर मुकाबला किया। किसी तरह वो खुद और बापू को बचाकर घर ले आई। चोटें लगीं जरूर, लेकिन मात्र शरीर पर, मन सशक्त हो गया था। रेखा ने गांव में बदलाव की पहली जंग जीत ली थी। अगले दिन पौ फटते ही दरवाजे पर पत्थर फिकने लगे। आग के गोले भूसे की छत पर फेके जाने लगे। मां-बाप बुरी तरह घबरा रहे थे। रेखा ने हिम्मत न हारते हुए पीछे की दीवार तोड़कर सब को घर के बाहर निकाला और सीधे जा पहुंची मजिस्ट्रेट के सामने। मजिस्ट्रेट साहब ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करवाई। साथ ही आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस को आदेश दिया। कुछ ही दिनों बाद आरोपी गिरफ्तार हुए और कानून ने उन्हें उनको सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। इस तरह रेखा ने समाज में बदलाव को जन्म दिया और नारी होने का फर्ज निभाया।

2 टिप्पणियां:
बहुत ही प्रेरणादायक घटनाक्रम... उसे उतने ही बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने के लिए राहुल जी आप बधाई के पात्र हैं...
dhanyvaad lokendra bhai.
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