शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

आखिर कब तक सहोगे


सुबह की पहली किरण जैसे ही गुडिय़ा के मुंह पर पड़ती है, वह करवट बदलकर तकिए के नीचे सिर छुपा लेती है। वहीं दूसरी ओर मां जोर से आवाज लगाती है, गुडिय़ा ओ गुडिय़ा... चलो उठो कोचिंग नहीं जाना क्या? गुडिय़ा कोई जवाब नहीं देती। इतने में बड़ा भाई आकर ताकिया खींच लेता है। गुडिय़ा फिर भी नहीं उठती, वह जैसे ही चादर खींचने के लिए आगे बढ़ता है, छोटा भाई मोहित उसे रोक देता है। घर में मची भगदड़ देख हर मिडिल क्लास फैमिली की तरह, मां डांटना शुरू कर देती है। अब गुडिय़ा चुपचात उठकर अपना बिस्तर ठीक करने के बाद वहां से चली जाती है। मोहित भी बड़े भाई से कहता है कि चलो भैया क्योंकि यहां तो टेप रिकॉर्ड शुरू हो गया है।  मां इनकी बातों को सुनकर भी अनसुना कर देती है। शर्मा जी यानी की गुडिय़ा के पापा मॉर्निंग वॉक के बाद घर वापस आ जाते हैं। आते ही पत्नी को समझाते हैं कि भागवान बच्चे हैं शैतानियां तो करेंगे ही, उसमें इतना नाराज होने की क्या बाता है? मां का गुस्सा भी शांत हो जाता है। इसके बाद पूरा परिवार साथ बैठकर चाय पीता है। मां गुडिय़ा को सुबह जल्दी उठने की सलाह देती है। साथ ही याद भी दिलाती है कि मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारी कोचिंग के पास ही सांई बाबा का मंदिर है, वहां रोज जाया करो। गुडिय़ा तपाक से जवाब देती है अब से रोज जाऊंगी मां। चाय खत्म होते ही सब अपने-अपने काम में लग जाते हैं। पापा ऑफिस जाने की तैयारी करने लगते हैं। बड़ा भाई अपने क्लाइंट्स से फोन पर बातें करने लगता है, मोहित कॉलेज जाने के लिए तैयार होता है। गुडिय़ा भी अपने रुटीन के मुताबिक कॉलेज के लिए निकल जाती है। हर मध्यमवर्गीय परिवार की तरह मां दिनभर कामकाज में लगी रहती है। मां के जहन में कभी बच्चों की पढ़ाई कभी उनकी शादी और तो कभी इनकी तबीयत के खयाल आते रहते हैं। गुडिय़ा की चिंता मां को कुछ ज्यादा ही थी, क्योंकि वो उसको सबसे ज्यादा प्यार करती थी। उसकी शादी के लिए भी लड़कों की तलाश उसने शुरू कर दी थी। दोपहर होते-होते गुडिय़ा घर वापस आ जाती है। खाना और फिर थोड़ी देर आराम के बाद कोचिंग के लिए बैग उठाते ही मां उसे कोचिंग के बाद सांई बाबा मंदिर जाने की याद दिलाती है। रात आठ बजे गुडिय़ा कोचिंग से फ्री होती है, अब उसे मां की सलाह याद आ जाती है। वह अकेले मंदिर के लिए निकलती है। सड़क पर काफी तेजी से गाडिय़ां दौड़ रही थीं। अंधेरे को देखते हुए गुडिय़ा के मन में कुछ पल के लिए ख्याल आता है कि घर में झूठ बोल दूंगी कि मंदिर हो आई और बाबा को यहीं से नमस्कार, लेकिन अगले ही पल उसकी आस्तिकता आड़े आ जाती है। वह चल पड़ती है मंदिर के लिए। थोड़ी दूर चलने के बाद उसे अहसास होता है कि कुछ बाइक सवार उसका पीछा कर रहे हैं। वह तेज चलना शुरू कर देती है, बाइक सवार चार लड़के अभी भी पीछे-पीछे आते रहते हैं। थोड़ी ही देर बाद बदमाश उसके चारों ओर बाइक घुमाने लगते हैं। यह सारा तमाशा भीड़भाड़ वाली सड़क पर चल रहा था। गुडिय़ा मदद की नजरों से सड़क चलते लोगों की ओर देखती है, लेकिन कोई आगे नहीं आता। गुडिय़ा किसी तरह उनको चकमा देकर वहां से निकलकर एक अखबार के दफ्तर में घुस जाती है। बदमाश वहां भी आ धमकते हैं। जैसे ही बदमाशों को पता चलता है कि यह अखबार का दफ्तर है, वो वहां से खिसक लेते हैं।
                उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। घबराई, सकपकाई गुडिय़ा आपबीती पत्रकारों को बताती है। मीडियाकर्मी आनन-फानन में पुलिस कंट्रोल रूम फोन लगाते हैं। नजदीकी थाने को भी जानकारी दी जाती है। वायरलैस पर मैसेज दौड़ते ही आनन-फानन में पुलिस की गाडिय़ां पहुंचती हैं। इतने में गुडिय़ा घर पर भी सूचना कर देती है। पुलिस के पीछे-पीछे उसके भाई भी पहुंच जाते हैं। सारी कहानी सुनकर भाइयों को बहुत गुस्सा आता है। वो उसे वहां से ले जाते हैं। मीडिया के दबाव के चलते देर रात तक बदमाश पकड़े जाते हैं। अगले दिन गुडिय़ा को पहचाने के लिए बुलाया जाता है, लेकिन गुडिय़ा बदमाशों को पहचानने से मना कर देती है, जबकि एक रात पहले उसने दावा किया था कि वह बदमाशों के पहचानती है। यह बात सुनकर पुलिस कप्तान और पत्रकार दोनों परिजनों से संपर्क साधते हैं और कारण पूछते हैं। वहीं पुराना घिसा-घिसाया जवाब मिलता है, हम मिडिल क्लास फैमिली के लोग हैं। पुलिस के चक्करों में हमें नहीं पडऩा, इससे हमारी बेटी के बदनामी होगी। इतना कहकर फोन काट दिया जाता है। मामला ठंडा पड़ जाता है। पुलिस और मीडिया अपना ध्यान हटा लेते हैं।

                   गुडिय़ा या उसके घरवाले उन बदमाशों के खिलाफ मामला दर्ज करवाते तो उनको जरूर सजा मिलती। अब उन बदमाशों के हौसले और बुलंद हो गए होंगे, क्योंकि उनको पता है कि मामला दर्ज करवाने की हिम्मत कोई नहीं जुटाता। पुलिस भी यह जानती है कि जब मामला दर्ज होगा ही नहीं तो हम भी ज्यादा गंभीर क्यों हों, ले-देकर मामला सलटा लो। दरअसल हम जब तक ऐसे अपराधों के खिलाफ पुरजोर आवाज नहीं उठाएंगे तब तक यह रुकने वाला नहीं। या यूं कहें कि शायद गुडिय़ा या उसके जैसे अनेकों परिवार उस दिन का इंतजार कर रहे हैं कि जब उनकी बेटियों के बीच-बजार कपड़े फाड़े जाएंगे, लेकिन अब और तब में फर्क सिर्फ इतना होगा कि अभी मामला दर्ज करवाया नहीं और तब मामला मेेडिकल के बाद खुद-ब-खुद दर्ज हो जाएगा।

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