सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

बिल्लू का सबक- अच्छा इंसान बनने की कोशिश करो

(बाल जगत)


ये कहानी है रायबरेली के दक्ष और अथर्व की है। दोनों पक्के दोस्त थे। सब लोग दक्ष को प्यार से बिल्लू और अथर्व को कुक्कू बुलाते थे। बिल्लू पढऩे में होशियार था, जबकि कुक्कू सामान्य। बिल्लू को इस बात पर घमंड था, क्योंकि उसको क्लास में हमेशा ही शाबाशी मिलती थी। सब लोग उसे कुक्कू से ज्यादा तवज्जो देते थे, लेकिन कुक्कू के बातचीत के ढंग के सभी मुरीद थे, परन्तु टीचर बिल्लू की ज्यादा तारीफ किया करती थीं। धीरे-धीरे दोनों बड़े हुए। बिल्लू हमेशा कुक्कू से एक कदम आगे ही रहा। इस कारण कुक्कू के परिवार वाले हमेशा बिल्लू से कुक्कू की तुलना किया करते थे। कॉलेज तक दोनों ने साथ-साथ ही पढ़ाई की। अब तक कुक्कू ने अपना सामाजिक दायरा काफी बढ़ा लिया था। वहीं बिल्लू पढ़ाई में मस्त रहता था। कुक्कू की मां इस बात से काफी परेशान रहती थी। वो कुक्कू को बार-बार समझाती थी कि समाज में ज्यादातर लोग तुझे जानते हैं इसका मतलब यह नहीं कि सब तुझे पसंद ही करते हैं। अरे पढ़-लिख जाएगा तो सब सलाम ठोकेंगे, तारीफ करेंगे नहीं तो सब लोग पीठ-पीछे तेरी नहीं, हमारी बुराई करेंगे। कुक्कू को मां की यह बातें काफी बुरी लगती थीं, लेकिन वो भी क्या करे उसका मन पढ़ार्ई में ज्यादा न लगता था। परिस्थितियां बदलने के साथ-साथा कुक्कू और बिल्लू की राह भी बदल गई। बिल्लू पढऩे के लिए रायबरेली छोड़कर लखनऊ निकल गया, जबकि कुक्कू रायबरेली में रहा। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे कम होने लगी। लगभग पूरा दिन साथ बिताने वाले दोस्त अब कभी-कभी ही बात करते थे। कुक्कू को बिल्लू की बहुत याद आती थी। वहीं बिल्लू अपने नए दोस्तों में मस्त हो चुका था। एक बार किसी काम से कुक्कू लखनऊ गया तो उसने सोचा क्यों न बिल्लू से भी मिल लिया जाए। वो बिल्लू से मिलने उसके कॉलेज गया, लेकिन बिल्लू ने पहचान तक न दिखाई। बिल्लू अब शहरी हो गया था। बड़े-बड़े ख्वाब देखने लगा था। बिल्लू अपनी मां की बात (बेटा चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ पर पैर जमीन पर ही रहने देना) को पूरी तरह भूल चुका था। कुक्कू बुरी याद लेकर वापस लौट गया। वापस घर जाते समय, कार में उसके पहचान वाले ने उससे पूछा- क्योंï, मिल आए अपने दोस्त से? तो उसने बुझे मन से कहा, हां मिल आया। कुक्कू का साथी (बड़ी राजनीतिक पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष) सब समझ गया और उसने कहा कि दोस्त चिंता मत करो वक्त सब का आता है। अब दोनों की दोस्ती लगभग खत्म हो चुकी थी। बिल्लू की होशियारी के किस्से कुक्कू को बीच-बीच में मिलते रहे। इसी बीच बिल्लू को एक बड़ी कंपनी से बड़ा सा ऑफर मिला। लखनऊ में छह महीने की ट्रेनिंग के बाद मुंबई जॉइन करना था।
            अब समय करवट लेने वाला था और इसी दिन का इंतजार कुक्कू को भी था। बड़ी राजनीतिक पार्टी ने कुक्कू को उसकी सामाजिक छवि और निचले तबके तक पकड़ को देखते हुए चुनाव लड़ाने का निर्णय लिया। इधर, कुक्कू चुनाव अभियान में व्यस्त हो गया और उधर, बिल्लू ट्रेनिंग में मस्त हो गया। अब आए दिन अखबारों में अथर्व प्रताप सिंह (कुक्कू) का नाम छपने लगा। यह नाम अखबार में पढ़कर बिल्लू को जाना पहचाना महसूस होता था, पर उसने कभी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। अंतत: कुक्कू अपने चुनाव अभियान में सफल हुआ। उसके क्षेत्र की जनता ने उसके व्यवहार और वाकपटुता के चलते सिर आंखों पर बिठ लिया और वो सांसद बन गया। अब लखनऊ की फिजाओं में अथर्व प्रताप सिंह का नाम गूंजने लगा। इस बीच बिल्लू की ट्रेनिंग भी पूरी होने वाली थी और पुलिस इनवेस्टिगेशन होना बकाया था। लखनऊ में हुए झगड़े में बिल्लू के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यही मामला उसकी राह का रोड़ा बन गया। इस मामले के कारण बिल्लू को नो-ड्यूस नहीं मिला। कंपनी ने बिल्लू को बता दिया कि तुम बहुत होशियार हो। हमें तुम्हारा काम भी पसंद है, लेकिन तुम्हारे खिलाफ मामला दर्ज है। इसे किसी भी तरह निपटाओ। अब बिल्लू परेशान हो गया। उसने सारी बात अपने घर पर बताई। उसकी मां ने उसको बताया कि अरे बेटा कुक्कू की मदद क्यों नहीं लेता, वो तो अब बड़ा नेता बन गया है। तू ने सुना नहीं क्या नाम अथर्व प्रताप सिंह। तब बिल्लू को याद आ गया कि जिसके बारे में वो रोज अखबार में पढ़ता था वो उसका बचपन का दोस्त कुक्कू है।
                      बिल्लू भी जानता था कि उसने कुक्कू के साथ कैसा व्यवहार किया था। इस कारण बिल्लू, कुक्कू से बात करने में हिचकिचा रहा था। किसी तरह हिम्मत बांधकर बिल्लू, कुक्कू के बंगले के बाहर जाकर खड़ा हो गया। देखा तो चारों ओर सुरक्षा का घेरा बिना इजाजत कोई अंदर नहीं जा पा रहा था। कुक्कू ने बिल्लू को बाहर खड़े देखा तो कुक्कू सुरक्षा घेरा ओर सारे लोगों को छोड़कर सीधे बंगले के बाहर बिल्लू को लेने पहुंच गया। यह देख सभी भौचक रह गए। कुक्कू के पीए से रहा न गया और वो तपाक से बोला, साहब साधारण से आदमी के लिए इतना प्रेम? तो कुक्कू ने डांटते हुए कहा कि ये कोई साधारण आदमी नहीं मेरे बचपन का दोस्त (बिल्लू) दक्ष है। दुर्भाग्य से इसके पैर जमीन से उठ गए थे पर शायद अब वापस जमीन पर आ गए हैं। ऐसा कहते हुए कुक्कू ने बिल्लू की जेब में नो-ड्यूज रख दिया। इसके बाद दोनों गले मिले।
                    तो मेरे नन्हें दोस्तों जीवन में चाहे जितने बड़े आदमी बन जाओ, अपने पहले के हालात, पुराने दोस्तों और माता-पिता की बताई हुई बातों को कभी न भूलना, क्योंकि ये ही जीवन का आधार हैं। इसी से तुम्हारी समाज में पहचान बनती है, क्योंकि अमीर तो बहुत लोग बन जाते हैं पर अच्छा इंसान बहुत कम लोग बन पाते हैं।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

राहुल की जुबानी: वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

राहुल की जुबानी: वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

मुंबई में एक बार फिर सुबह हुई। देखते ही देखते सूरज की किरणें इस शहर को फिर रफ्तार देने के लिए फैल गईं, लेकिन मेरी किस्मत में यह सुबह कड़वी हकीकत लेकर आई। मैं नाली के किनारे सड़क पर पड़ी थी। सिर पर चोट के कारण खून बह रहा था। दर्द से बिलख उठी, रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। तब किसी ने मुझे उठाया और मेरे जख्मों पर दवा लगाने के बाद मुझे अनाथालय पहुंचा दिया। तब मेरी उम्र कुछ छह माह रही होगी। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ यह जानने-समझने में, मैं सक्षम नहीं थी। खैर, अनाथालय में मेरी परवरिश शुरू हुई। वहां के सुप्रीटेंडेंट और हेल्परों ने ही मेरी परवरिश की। धीरे-धीरे मैं बड़ी हो गई। सोचने-समझने की शक्ति आ चुकी थी। तब पता चला कि मेरे साथ ऐसा हुआ। मेरे मां-बाप ने मुझे पैदा होने के बाद सड़क पर मर जाने के लिए फेंक दिया था, लेकिन हाय री मेरी किस्मत मैं मरी भी नहीं, अगर मर जाती तो शायद मेरे माता-पिता की कोशिश तो कामयाब होती...
         समय की ठोकरों ने बहुत कुछ सिखा दिया था। बड़े होने पर ठान लिया अब तो जिंदगी की जंग जीतनी ही है। किसी भी हालत में अपनी तकदीर को बदलना है। खूब मन लगाकर पढ़ाई की। धीरे-धीरे क्लास दर क्लास मैं आगे बढ़ती गई। दसवीं, बारहवीं में अव्वल रही फिर सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में नाम कमाने की ठान ली। मैं अपनी मेहनत और किस्मत के बल-बूते आगे बढ़ती गई। कॉलेज में कैम्पस सिलेक्शन में भी मुझे अच्छी नौकरी मिल गई। मैं अंधेरी की सॉफ्टवेयर कंपनी में घाटकोपर से रोज अप-डाउन करने लगी। ट्रेन में ही मेरी पहचान मनोज से हुई। मनोज रोज मिलता था, पर कभी बात नहीं होती थी। वो रोज मेरी तरफ देखकर मुस्कराते और मैं भी। एक दिन मुझे स्टेशन पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रेंगने लगी और मैं ट्रेन में चढऩे के दौड़ी रही थी, इतने में ही मनोज ने हाथ बढ़ाया और मुझे अंदर खींच लिया। उस दिन हमारे रिश्ते की नींव पड़ी। मेरे दिल में किसी अंजान से रिश्ते के छींटे पड़ चुके थे। मन थोड़ा बहुत खुश था और असहज भी।
                 खैर लोकल में अन्य लोग ज्यादा समय नहीं देते और वैसा ही हुआ अगले स्टेशन पर उतरने वालों ने हमारे मन में लगातार आ रहे बहुत से ख्यालों पर विराम लगा दिया और बहुत सारे धक्के लगने लगे। मनोज ने मुझे फिर सहारा दिया और हमें जैसे-तैसे अंदर बैठने की जगह मिल गई, क्योंकि कुर्ला स्टेशन आ चुका था। ऑफिस तक का सफर काफी लंबा था, तो उस दिन हमने बहुत सारी बातें कीं। तब पता चला कि उसका ऑफिस मेरे ऑफिस के पास ही है। शाम को मिलना तय हुआ। साथ-साथ वड़ा पाव खाते-खाते ऑफिस से स्टेशन गए। साथ-साथ ही ट्रेन भी पकड़ी। अब यह रोज का सिलसिला हो चला था। धीरे-धीरे प्यार गहरा हो चुका था। वीकेंड कभी मरीन ड्राइव, गेट ऑफ इंडिया तो अन्य स्थानों पर गुजरने लगी, डिनर साथ-साथ ही करते थे। मनोज के रिश्ते के सिवाय मुझे किसी और रिश्ते का अहसास न होने के कारण वो मुझे जान से प्यार हो गया था। एक दिन वो मुझे अपने घर पर ले गया, मुझे अपने घर पर मिलवाया। मैं उस दिन बहुत डरी हुई थी। आंटी ने मुझसे वो ही पूछ लिया, जिसका मुझे डर था। अनाथ शब्द एक बार फिर मेरे सामने खड़ा था। उनकी आंखों में मेरे नाजायज, जायज और तथाकथित सामाजिक सरोकारों से जुड़े सवाल तैरते दिखाई देने लगे थे। उसके बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होने लगा, फिर मनोज ने महौल को संभाला और मुझे लेकर  बाहर आ गया। मनोज ने मुझे समझाया कि वो अपनी मां को मना लेगा, पर मां कहां मानने वाली थीं। उनका विरोध जस का तस रहा, मनोज के पापा को कोई परेशानी नहीं थी। धीरे-धीरे मेरा उसके घर आना-जाना बढ़ गया। मुझे लगने लगा था कि मैं मनोज की मां के दिल मैं जगह बना लूंगी। पापा ने तो मुझे बहू के रूप में स्वीकार ही लिया था। एक दिन मम्मी ने भी पीला सिग्रल दिखा दिया। मुझे लगने लगा था कि अब मेरे भी घर होगा। मेरे भी अपने रिश्ते होंगे, जो मैंने खुद बुने हैं। एक दिन रोज की तरह 8:57 की लोकल पकडऩे के लिए मैं घर से निकली। इतने में ही मेरे फोन की घंटी बजने लगी, स्क्रीन पर मनोज था मैंने तुरंत अपनी घड़ी देखी, मैं आज लेट थी। मैंने मनोज से कहा कि मैं बस दो मिनट में पहुंच रही हूं। जल्दी-जल्दी स्टेशन पर पहुंची। देखा तो स्टेशन के जीने पर बहुत भीड़ थी। मैं जल्दी-जल्दी जीने से उतरने लगी। मैं आधे जीने पर ही थी कि ट्रेन रेंगने लगी। मनोज गेट पर मुझे थामने के लिए आ चुका था। मैं प्लेटफॉर्म पर दौड़ी, उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया। मुझे पूरा भरोसा था कि वो मुझे अपनी बाहों में समेट लेगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जल्दीबाजी में मेरा पैर डोर स्टेप पर न जाकर, प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच में चला गया। मनोज ने मुझे खींचने की बहुत कोशिश की पर वो न कर सका और मैं ट्रैक पर गिर पड़ी। स्टेशन पर चीखपुकार मच गई। ट्रेन रुकने के बाद मुझे बाहर निकाला गया। जब अस्पताल में मेरी आंख खुली तो जिंदगी पूरी तरह बल चुकी थी। मेरे दोनों पैरों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया था। ट्रैक पर फंसने के कारण दोनों पैरों की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं और डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान दोनों पैरों को काट दिया और जिंदगीभर के लिए बैसाखियां पकड़ा दीं। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब मैं फिर 8:57 की ट्रेन पकडऩे वहां पहुंची तो उसी ट्रेन से रोज जाने वाले लोग तो थे, पर मनोज नहीं था। वो मुझे फिर कभी नहीं मिला। मेरी जिंदगी एक बार फिर वीरान हो चुकी थी। इससे अच्छा तो यह होता कि जब मुझे मेरे मां-बाप ने सड़क पर फेंका था, मैं तब ही मर जाती।
         सच ही है, जल्दी ट्रेन पकडऩे की चाह रखने के चलते कई मुंबईकरों को कुछ इसी तरह जिंदगी भर का गम मिलता है। समय से आगे निकल जाने की इच्छा, हमें कोसों पीछे धकेल देती है। इसके विपरीत इस शहर की एक खासियत और है कि वो कभी हारने नहीं देता। मैं आज भी 8:57 की ट्रेन से ऑफिस जाती हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि साधारण डिब्बे की जगह विकलांगों के डिब्बे में।