शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

वक्त ने पैर काटकर पकड़ा दीं बैसाखियां...

मुंबई में एक बार फिर सुबह हुई। देखते ही देखते सूरज की किरणें इस शहर को फिर रफ्तार देने के लिए फैल गईं, लेकिन मेरी किस्मत में यह सुबह कड़वी हकीकत लेकर आई। मैं नाली के किनारे सड़क पर पड़ी थी। सिर पर चोट के कारण खून बह रहा था। दर्द से बिलख उठी, रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। तब किसी ने मुझे उठाया और मेरे जख्मों पर दवा लगाने के बाद मुझे अनाथालय पहुंचा दिया। तब मेरी उम्र कुछ छह माह रही होगी। मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ यह जानने-समझने में, मैं सक्षम नहीं थी। खैर, अनाथालय में मेरी परवरिश शुरू हुई। वहां के सुप्रीटेंडेंट और हेल्परों ने ही मेरी परवरिश की। धीरे-धीरे मैं बड़ी हो गई। सोचने-समझने की शक्ति आ चुकी थी। तब पता चला कि मेरे साथ ऐसा हुआ। मेरे मां-बाप ने मुझे पैदा होने के बाद सड़क पर मर जाने के लिए फेंक दिया था, लेकिन हाय री मेरी किस्मत मैं मरी भी नहीं, अगर मर जाती तो शायद मेरे माता-पिता की कोशिश तो कामयाब होती...
         समय की ठोकरों ने बहुत कुछ सिखा दिया था। बड़े होने पर ठान लिया अब तो जिंदगी की जंग जीतनी ही है। किसी भी हालत में अपनी तकदीर को बदलना है। खूब मन लगाकर पढ़ाई की। धीरे-धीरे क्लास दर क्लास मैं आगे बढ़ती गई। दसवीं, बारहवीं में अव्वल रही फिर सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में नाम कमाने की ठान ली। मैं अपनी मेहनत और किस्मत के बल-बूते आगे बढ़ती गई। कॉलेज में कैम्पस सिलेक्शन में भी मुझे अच्छी नौकरी मिल गई। मैं अंधेरी की सॉफ्टवेयर कंपनी में घाटकोपर से रोज अप-डाउन करने लगी। ट्रेन में ही मेरी पहचान मनोज से हुई। मनोज रोज मिलता था, पर कभी बात नहीं होती थी। वो रोज मेरी तरफ देखकर मुस्कराते और मैं भी। एक दिन मुझे स्टेशन पहुंचने में थोड़ी देर हो गई। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर रेंगने लगी और मैं ट्रेन में चढऩे के दौड़ी रही थी, इतने में ही मनोज ने हाथ बढ़ाया और मुझे अंदर खींच लिया। उस दिन हमारे रिश्ते की नींव पड़ी। मेरे दिल में किसी अंजान से रिश्ते के छींटे पड़ चुके थे। मन थोड़ा बहुत खुश था और असहज भी।
                 खैर लोकल में अन्य लोग ज्यादा समय नहीं देते और वैसा ही हुआ अगले स्टेशन पर उतरने वालों ने हमारे मन में लगातार आ रहे बहुत से ख्यालों पर विराम लगा दिया और बहुत सारे धक्के लगने लगे। मनोज ने मुझे फिर सहारा दिया और हमें जैसे-तैसे अंदर बैठने की जगह मिल गई, क्योंकि कुर्ला स्टेशन आ चुका था। ऑफिस तक का सफर काफी लंबा था, तो उस दिन हमने बहुत सारी बातें कीं। तब पता चला कि उसका ऑफिस मेरे ऑफिस के पास ही है। शाम को मिलना तय हुआ। साथ-साथ वड़ा पाव खाते-खाते ऑफिस से स्टेशन गए। साथ-साथ ही ट्रेन भी पकड़ी। अब यह रोज का सिलसिला हो चला था। धीरे-धीरे प्यार गहरा हो चुका था। वीकेंड कभी मरीन ड्राइव, गेट ऑफ इंडिया तो अन्य स्थानों पर गुजरने लगी, डिनर साथ-साथ ही करते थे। मनोज के रिश्ते के सिवाय मुझे किसी और रिश्ते का अहसास न होने के कारण वो मुझे जान से प्यार हो गया था। एक दिन वो मुझे अपने घर पर ले गया, मुझे अपने घर पर मिलवाया। मैं उस दिन बहुत डरी हुई थी। आंटी ने मुझसे वो ही पूछ लिया, जिसका मुझे डर था। अनाथ शब्द एक बार फिर मेरे सामने खड़ा था। उनकी आंखों में मेरे नाजायज, जायज और तथाकथित सामाजिक सरोकारों से जुड़े सवाल तैरते दिखाई देने लगे थे। उसके बाद घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होने लगा, फिर मनोज ने महौल को संभाला और मुझे लेकर  बाहर आ गया। मनोज ने मुझे समझाया कि वो अपनी मां को मना लेगा, पर मां कहां मानने वाली थीं। उनका विरोध जस का तस रहा, मनोज के पापा को कोई परेशानी नहीं थी। धीरे-धीरे मेरा उसके घर आना-जाना बढ़ गया। मुझे लगने लगा था कि मैं मनोज की मां के दिल मैं जगह बना लूंगी। पापा ने तो मुझे बहू के रूप में स्वीकार ही लिया था। एक दिन मम्मी ने भी पीला सिग्रल दिखा दिया। मुझे लगने लगा था कि अब मेरे भी घर होगा। मेरे भी अपने रिश्ते होंगे, जो मैंने खुद बुने हैं। एक दिन रोज की तरह 8:57 की लोकल पकडऩे के लिए मैं घर से निकली। इतने में ही मेरे फोन की घंटी बजने लगी, स्क्रीन पर मनोज था मैंने तुरंत अपनी घड़ी देखी, मैं आज लेट थी। मैंने मनोज से कहा कि मैं बस दो मिनट में पहुंच रही हूं। जल्दी-जल्दी स्टेशन पर पहुंची। देखा तो स्टेशन के जीने पर बहुत भीड़ थी। मैं जल्दी-जल्दी जीने से उतरने लगी। मैं आधे जीने पर ही थी कि ट्रेन रेंगने लगी। मनोज गेट पर मुझे थामने के लिए आ चुका था। मैं प्लेटफॉर्म पर दौड़ी, उसने भी अपना हाथ आगे बढ़ाया। मुझे पूरा भरोसा था कि वो मुझे अपनी बाहों में समेट लेगा, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जल्दीबाजी में मेरा पैर डोर स्टेप पर न जाकर, प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच में चला गया। मनोज ने मुझे खींचने की बहुत कोशिश की पर वो न कर सका और मैं ट्रैक पर गिर पड़ी। स्टेशन पर चीखपुकार मच गई। ट्रेन रुकने के बाद मुझे बाहर निकाला गया। जब अस्पताल में मेरी आंख खुली तो जिंदगी पूरी तरह बल चुकी थी। मेरे दोनों पैरों ने भी मेरा साथ छोड़ दिया था। ट्रैक पर फंसने के कारण दोनों पैरों की हड्डियां चकनाचूर हो गई थीं और डॉक्टर ने ऑपरेशन के दौरान दोनों पैरों को काट दिया और जिंदगीभर के लिए बैसाखियां पकड़ा दीं। अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब मैं फिर 8:57 की ट्रेन पकडऩे वहां पहुंची तो उसी ट्रेन से रोज जाने वाले लोग तो थे, पर मनोज नहीं था। वो मुझे फिर कभी नहीं मिला। मेरी जिंदगी एक बार फिर वीरान हो चुकी थी। इससे अच्छा तो यह होता कि जब मुझे मेरे मां-बाप ने सड़क पर फेंका था, मैं तब ही मर जाती।
         सच ही है, जल्दी ट्रेन पकडऩे की चाह रखने के चलते कई मुंबईकरों को कुछ इसी तरह जिंदगी भर का गम मिलता है। समय से आगे निकल जाने की इच्छा, हमें कोसों पीछे धकेल देती है। इसके विपरीत इस शहर की एक खासियत और है कि वो कभी हारने नहीं देता। मैं आज भी 8:57 की ट्रेन से ऑफिस जाती हूं, बस फर्क सिर्फ इतना है कि साधारण डिब्बे की जगह विकलांगों के डिब्बे में।

2 टिप्‍पणियां:

shishir srivastava ने कहा…

mubaarak ho "LEKHAK: Saa'b
maza aa gaya

RaghVendra ने कहा…

Good Going.. I like it !!!!